Friday, 24 May 2002

Monday, 16 April 2001

“लाल परचा” – भगत सिंह और बी.के. दत्त

हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातांत्रिक सेना (सूचना)
“बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊंची आवाज की आवश्यकता होती है।”, प्रसिद्ध फ्रांसीसी अराजकतावादी शहीद बैलियाँ के यह अमर शब्द हमारे काम के औचित्य के साक्षी हैं।
पिछले दस वर्षों में ब्रिटिश सरकार ने शासन/सुधार के नाम पर इस देश का जो अपमान किया है, उसकी कहानी दोहराने की आवश्यकता नहीं और ना ही हिंदुस्तानी पार्लियामेंट पुकारी जाने वाली इस सभा ने भारतीय राष्ट्र के सिर पर पत्थर फेंक कर उसका जो अपमान किया है, उसके उदाहरणों को याद दिलाने की आवश्यकता है। यह सब सर्वविदित और स्पष्ट है। आज फिर जब लोग ‘साइमन कमीशन’ से कुछ सुधारों के टुकड़ों की आशा में आंखें फैलाएं हैं और इन टुकड़ों के लोभ में आपस में झगड़ रहे हैं। विदेशी सरकार ‘सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक’ (पब्लिक सेफ्टी बिल) और ‘उद्योगिक विवाद विधेयक’ (ट्रेड डिस्प्यूटस बिल) के रूप में अपने दमन को और भी कड़ा कर लेने का यतन कर रही है। इसके साथ ही आने वाले अधिवेशन में “अखबार द्वारा राजधरोह रोकने का कानून” (प्रेस सडीशन एक्ट) जनता पर कसने की भी धमकी दी जा रही है। सार्वजनिक काम करने वाले मजदूर नेताओं की अंधाधुंध गिरफ्तारीयां यह स्पष्ट कर देती हैं कि सरकार किस रवैये पर चल रही है।
राष्ट्रीय दमन और अपमान कि इस उत्तेजना पूर्ण परिस्थिति में अपने उत्तरदायित्व की गंभीरता को महसूस कर ‘हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र सेना’ ने अपनी सेना को यह कदम उठाने की आज्ञा दी है। इस कार्य का प्रयोजन है कि कानून का यह अपमानजनक प्रहसन समाप्त कर दिया जाए। विदेशी शोषक नौकरशाही जो चाहे करे, परंतु उसकी वैधानिकता का नकाब फाड़ देना आवश्यक है।
जनता के प्रतिनिधियों से हमारा आग्रह है कि वह इस पार्लियामेंट के पखंड को छोड़कर अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों को लौट जाएं और जनता को विदेशी दमन और शोषण के विरुद्ध क्रांति के लिए तैयार करें। हम विदेशी सरकार को यह बतला देना चाहते हैं कि हम ‘सार्वजनिक सुरक्षा’ और ‘औद्योगिक विवाद’ के दमनकारी कानूनों को, लाला लाजपत राय की हत्या के विरोध में, देश की जनता की ओर से यह कदम उठा रहे हैं।
हम मनुष्य के जीवन को पवित्र समझते हैं। हम ऐसे उज्जवल भविष्य में विश्वास रखते हैं, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण शांति और सवतंत्रता का अवसर मिल सके। हम इंसान का खून बहाने की अपनी विवशता पर दुखी हैं। परंतु क्रांति द्वारा सबको सम्मान सवतंत्रता देने और मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को समाप्त कर देने के लिए क्रांति में कुछ ना कुछ रक्तपात अनिवार्य है।
इंकलाब जिंदाबाद
बलराज
कमांडर इन चीफ
हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातांत्रिक सेना

“ਲਾਲ ਪਰਚਾ” – ਭਗਤ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਬੀ.ਕੇ ਦੱਤ

{08 ਅਪਰੈਲ 1929 ਨੂੰ ਭਗਤ ਸਿੰਘ ਤੇ ਬੀ.ਕੇ. ਦੱਤ ਨੇ ਦਿੱਲੀ ਅਸੈਂਬਲੀ ਵਿੱਚ ‘ਪਬਲਿਕ ਸੇਫਟੀ ਬਿੱਲ’ ਅਤੇ ‘ਟਰੇਡ ਡਿਸਪਿੳੂਟ ਬਿੱਲ’ ਦੇ ਵਿਰੋਧ ਵਿੱਚ ਬੰਬ ਸੁਟਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ੲਿਹ ਪਰਚਾ ਸੁੱਟਿਅਾ। ੳੁਹ ਬੰਬ ਸੁੱਟਣ ਦਾ ਕਾਰਨ ਅਤੇ ਮਨੁੱਖੀ ਜਿੰਦਗੀ ਨਾਲ ਪਿਅਾਰ ਵਿਅੱਕਤ ਕੀਤਾ ਹੈ, ਜਿਸ ਕਾਰਨ ੳੁਹਨਾਂ ਸੱਰਿਅਾਂ ਤੋਂ ਬਗੈਰ ਬੰਬਾਂ ਨੂੰ ਵਰਤਿਅਾ}
“ਲਾਲ ਪਰਚਾ”
ਹਿੰਦਸਤਾਨ ਸਮਾਜਵਾਦੀ ਪਰਜਾਤੰਤਰ ਸੈਨਾ (ਸੂਚਨਾ)
“ਬੋਲਿਆਂ ਨੂੰ ਸੁਣਾਉਣ ਲਈ ਗਰਜ ਦੀ ਲੋੜ ਹੈ” ਇਹ ਅਮਰ ਸ਼ਬਦ ਫਰਾਂਸ ਦੇ ਇੱਕ ਬਹਾਦਰ ਅਰਾਜਕਤਾਵਾਦੀ ਸ਼ਹੀਦ ਵੈਲਿੰਨਟ ਨੇ ਇੱਕ ਇਹੋ ਜਿਹੇ ਮੌਕੇ ਤੇ ਹੀ ਆਖੇ ਸਨ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਹੀ ਸ਼ਬਦਾਂ ਨਾਲ ਅੱਜ ਅਸੀਂ ਆਪਣੇ ਕੰਮ ਦੀ ਪ੍ਰੋੜ੍ਹਤਾ ਕਰਦੇ ਹਾਂ।
ਇੱਥੇ ਅਸੀਂ ਸੁਧਾਰਾਂ (ਮੌਨਟੈਗੋ-ਚੇਲਮਸਫੋਰਡ ਰਿਫਾਰਮ) ਦੇ ਪਿਛਲੇ ਦਸ ਵਰ੍ਹਿਆਂ ਦੇ ਬੇਇੱਜ਼ਤੀ ਭਰੇ ਇਤਿਹਾਸ ਨੂੰ ਨਹੀਂ ਦੁਹਰਾਵਾਂਗਾ ਤੇ ਨਾ ਹੀ ਇਸ ਸਭਾ ਯਾਨੀ ਅਖੌਤੀ ਪਾਰਲੀਮੈਂਟ ਰਾਹੀਂ ਭਾਰਤੀ ਕੌਮ ਦੇ ਮੱਥੇ ਜੋ ਅਪਮਾਨ ਥੋਪੇ ਗਏ ਹਨ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਜ਼ਿਕਰ ਕਰਾਂਗੇ। ਅਸੀਂ ਤਾਂ ਸਿਰਫ ਇਹ ਦੱਸਣਾ ਚਾਹੁੰਦੇ ਹਾਂ ਕਿ ਜਦ ਇਹ ਲੋਕੀਂ ਸਾਈਮਨ ਕਮਿਸ਼ਨ ਤੋਂ ਹੋਰ ਕੁਝ ਸੁਧਾਰਾਂ ਦੀ ਜੂਠ ਦੀ ਆਸ ਕਰ ਰਹੇ ਹਨ ਅਤੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਉਡੀਕੀਆਂ ਜਾ ਰਹੀਆਂ ਹੱਡੀਆਂ ਦੀ ਵੰਡ ਲਈ ਆਪਸ ਵਿੱਚ ਲੜ ਝਗੜ ਵੀ ਰਹੇ ਹਨ, ਉਸ ਸਮੇਂ ਸਰਕਾਰ ਸਾਡੇ ਉੱਤੇ ‘ਪਬਲਿਕ ਸੇਫਟੀ ਬਿੱਲ’ ਅਤੇ ‘ਟ੍ਰੇਡ ਡਿਸਪਿਊਟ ਬਿੱਲ’ ਜਿਹੇ ਦਮਨਕਾਰੀ ਕਾਨੂੰਨ ਠੋਸ ਰਹੀ ਹੈ ਅਤੇ ਅਖਬਾਰਾਂ ਰਾਹੀਂ ਰਾਜਧ੍ਰੋਹ ਰੋਕਣ ਦਾ ਕਾਨੂੰਨ (ਪ੍ਰੈੱਸ ਸੇਡੀਸ਼ਨ ਬਿੱਲ) ਨੂੰ ਆਉਣ ਵਾਲੇ ਇਜਲਾਸਾਂ ਵਿੱਚ ਪੇਸ਼ ਕਰਨਾ ਮਿੱਥਿਆ ਗਿਆ ਹੈ ਖੁੱਲ੍ਹੇ ਤੌਰ ਤੇ ਕੰਮ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਮਜ਼ਦੂਰ ਆਗੂਆਂ ਦੀਆਂ ਅੰਨ੍ਹੇਵਾਹ ਗ੍ਰਿਫ਼ਤਾਰੀਆਂ ਤੋਂ ਸਾਫ ਦਿੱਸਦਾ ਹੈ ਕਿ ਹਵਾ ਦਾ ਰੁੱਖ ਕਿੱਧਰ ਹੈ।
ਇਨ੍ਹਾਂ ਬੇਹੱਦ ਭੜਕਾਊ ਹਾਲਤਾਂ ਵਿੱਚ ਹਿੰਦੁਸਤਾਨ ਸਮਾਜਵਾਦੀ ਪਰਜਾਤੰਤਰ ਸੰਘ ਨੇ ਪੂਰੀ ਸੰਜੀਦਗੀ ਨਾਲ ਅਤੇ ਪੂਰੀ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਦਾ ਅਹਿਸਾਸ ਕਰਦੇ ਹੋਏ, ਇਹ ਫੈਸਲਾ ਕੀਤਾ ਹੈ, ਅਤੇ ਆਪਣੀ ਫ਼ੌਜ ਨੂੰ, ਇਹ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਕੰਮ ਕਰਨ ਦਾ ਹੁਕਮ ਦਿੱਤਾ ਹੈ, ਤਾਂ ਕਿ ਇਸ ਜ਼ਲੀਲ ਕਰਨ ਵਾਲੀ ਸ਼ਕਤੀ ਨੂੰ ਠੱਲ੍ਹ ਪਾਈ ਜਾ ਸਕੇ। ਵਿਦੇਸ਼ੀ ਨੌਕਰਸ਼ਾਹੀ ਦੇ ਲੁਟੇਰੇ ਮਨਮਾਨੀ ਪਏ ਕਰਨ, ਪਰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਅਸਲ ਰੂਪ ਜਨਤਾ ਸਾਹਮਣੇ ਨੰਗਾ ਕਰਨਾ ਜ਼ਰੂਰੀ ਹੈ।
ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਪ੍ਰਤੀਨਿਧ ਆਪਣੇ ਹਲਕਿਆਂ ਨੂੰ ਵਾਪਸ ਚਲੇ ਜਾਣ ਅਤੇ ਜਨਤਾ ਨੂੰ ਆ ਰਹੇ ਇਨਕਲਾਬ ਲਈ ਤਿਆਰ ਕਰਨ। ਸਰਕਾਰ ਵੀ ਸਮਝ ਲਵੇ ਕਿ ਭਾਰਤ ਦੀ ਬੇਵੱਸ ਜਨਤਾ ਵੱਲੋਂ ਪਬਲਿਕ ਸੇਫਟੀ ਬਿੱਲ, ਟਰੇਡ ਡਿਸਪਿਊਟ ਬਿੱਲ ਅਤੇ ਲਾਲਾ ਲਾਜਪਤ ਰਾਏ ਦੇ ਵਹਿਸ਼ੀਆਨਾ ਕਤਲ ਦੇ ਵਿਰੁੱਧ ਰੋਸ ਪ੍ਰਗਟ ਕਰਦੇ ਹੋਏ ਅਸੀਂ ਇਸ ਇਤਿਹਾਸਕ ਸਬਕ ‘ਤੇ ਜ਼ੋਰ ਦੇਣਾ ਚਾਹੁੰਦੇ ਹਾਂ ਕਿ ਤੁਸੀਂ ਵਿਅਕਤੀਆਂ ਨੂੰ ਖ਼ਤਮ ਕਰ ਸਕਦੇ ਹੋ ਪਰ ਵਿਚਾਰਾਂ ਨੂੰ ਨਹੀਂ ਵਿਸ਼ਾਲ ਸਾਮਰਾਜ ਮਿੱਟੀ ਵਿੱਚ ਮਿਲ ਗਏ ਪਰ ਵਿਚਾਰ ਕਾਇਮ ਰਹੇ। ਬਰਬਨ (Bourbons) ਤੇ ਜ਼ਾਰ ਢਹਿ ਢੇਰੀ ਹੋ ਗਏ ਅਤੇ ਇਨਕਲਾਬ ਜਿੱਤ ਦੇ ਤਰਾਨੇ ਗਾਉਂਦਾ ਅੱਗੇ ਵੱਧਦਾ ਗਿਆ।
ਅਸੀਂ ਮਨੁੱਖੀ ਜੀਵਨ ਨੂੰ ਬੜਾ ਪਵਿੱਤਰ ਮੰਨਦੇ ਹਾਂ ਅਤੇ ਉਸ ਦੇ ਸੁਨਹਿਰੀ ਭਵਿੱਖ ਦਾ ਸੁਪਨਾ ਵੇਖਦੇ ਹਾਂ ਜਦੋਂ ਮਨੁੱਖ ਪੁੂਰਣ ਸ਼ਾਂਤੀ ਤੇ ਆਜ਼ਾਦੀ ਵਿੱਚ ਵਿਚਰੇਗਾ। ਸਾਨੂੰ ਇਹ ਪ੍ਰਵਾਨ ਕਰਦਿਆਂ ਦੁੱਖ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਕਿ ਅਸੀਂ ਇਨਕਲਾਬ ਅਸੀਂ ਇਨਸਾਨੀ ਖੂਨ ਡੋਲ੍ਹਣ ‘ਤੇ ਮਜਬੂਰ ਕੀਤੇ ਗਏ ਹਾਂ।
ਪਰ ਸਭਨਾਂ ਲਈ ਆਜ਼ਾਦੀ ਲਿਆਉਣ ਵਾਲੇ ਅਤੇ ਮਨੁੱਖ ‘ਹੱਥੋਂ’ ਮਨੁੱਖ ਦੀ ਲੁੱਟ ਖਸੁੱਟ ਨੂੰ ਜੜ੍ਹੋਂ ਖ਼ਤਮ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਮਹਾਨ ਇਨਕਲਾਬ ਦੀ ਵੇਦੀ ਉੱਤੇ ਕੁਝ ਕੁ ਵਿਅਕਤੀ ਦੀ ਬਲੀ ਅਟੱਲ ਹੈ।
ੲਿਨਕਲਾਬ ਜਿੰਦਾਬਾਦ
ਦਸਤਖਤ
ਬਲਰਾਜ
ਕਮਾਂਡਰ ਇਨ ਚੀਫ
ਹਿ.ਸ.ਪ੍ਰ.ਸ.
8.4.29

Sunday, 15 April 2001

शहीद कर्तार सिंह सराभा

रणचण्डी के इस परम भक्त विद्रोही कर्तार सिंह की आयु अभी बीस वर्ष की भी नहीं हुई थी कि जब उन्होंने स्वतन्त्रता-देवी की बलिवेदी पर अपना बलिदान दे दिया। आँधी की तरह वह अचानक कहीं से आये, अग्नि प्रज्वलित की और सपनों में पड़ी रणचण्डी को जगाने की कोशिश की। विद्रोह का यज्ञ रचा और आख़िर वह स्वयं इसमें भस्म हो गये। वे क्या थे, किस दुनिया से अचानक आये और झट कहाँ चले गये? हम कुछ भी न जान सके। 19 वर्ष की आयु में ही उन्होंने इतने काम कर दिखाये कि सोचकर हैरानी होती है। इतनी ज़ुर्रत, इतना आत्मविश्वास, इतना आत्मत्याग और ऐसी लगन बहुत कम देखने को मिलती है। भारतवर्ष में ऐसे इन्सान बहुत कम पैदा हुए हैं, जिनको सही अर्थों में विद्रोही कहा जा सकता है, परन्तु इन गिने-चुने नेताओं में कर्तार सिंह का नाम सूची में सबसे ऊपर है। उनकी रग-रग में क्रान्ति का जज़्बा समाया हुआ था। उनकी ज़िन्दगी का एक ही लक्ष्य, एक ही इच्छा और एक ही आशा, जो भी था – क्रान्ति थी, इसीलिए उन्होंने ज़िन्दगी में पाँव रखा और आख़िर इसीलिए इस दुनिया से कूच कर गये।
आपका जन्म 1896 में गाँव सराभा, ज़िला लुधियाना में हुआ था। आप माता-पिता के इकलौते बेटे थे। अभी इनकी आयु बहुत कम थी कि पिताजी का देहावसान हो गया। परन्तु आपके दादा ने बहुत प्रयत्न से आपको पाला। नवीं कक्षा पढ़ने के बाद आप अपने चाचा के यहाँ चले गये। वहाँ उन्होंने दसवीं की परीक्षा पास की और कॉलेज में पढ़ने लगे। यह 1910-11 के दिन थे। इधर आपको स्कूल और कॉलेज के पाठ्यक्रम के तंग दायरे से बाहर की बहुत-सी पुस्तकें पढ़ने का अवसर मिला। यह आन्दोलन का ज़माना था। इस वातावरण में रहकर आपकी देशप्रेम की भावना पल्लवित हुई।
इसके बाद आपकी अमेरिका जाने की इच्छा हुई। घरवालों ने उसका कोई विरोध नहीं किया। आपको अमेरिका भेज दिया गया। सन् 1912 में आप सानफ्रांसिस्को की बन्दरगाह पर पहुँचे। आज़ाद देश में पहुँचकर क़दम-क़दम पर आपके कोमल हृदय पर चोट पड़ने लगी। इन गोरों की ज़बान से Damn Hindu (तुच्छ हिन्दू) और Black Man (काला आदमी) आदि सुनते ही वे पागल हो उठते थे। उनको क़दम-क़दम पर देश की इज़्ज़त व सम्मान ख़तरे में नज़र आने लगे। घर की याद आने पर ज़ंजीरों में जकड़ा हुआ विवश भारत सामने आ जाता। उनका कोमल दिल धीरे-धीरे सख़्त होने लगा और देश की आज़ादी के लिए ज़िन्दगी क़ुर्बान करने का निश्चय दृढ़ होता गया। उनके दिल पर उस समय क्या गुज़रती थी, यह हम कैसे समझ सकते हैं।
यह असम्भव था कि वे चैन से रह पाते। हर समय उनके सामने यह प्रश्न उठने लगा कि यदि शान्ति से काम न चला तो देश आज़ाद किस तरह होगा? फिर बिना अधिक सोचे उन्होंने भारतीय मज़दूरों का संगठन शुरू कर दिया। उनमें आज़ादी की भावना उभरने लगी। हर मज़दूर के पास घण्टों बैठकर वे समझाने लगे कि अपमान से भरी ग़ुलामी की ज़िन्दगी से तो मौत हज़ार दर्जा अच्छी है। काम शुरू होने पर और लोग भी उनसे आ मिले। मई, 1912 में इन लोगों की एक ख़ास बैठक हुई। इसमें कुछ चुनिन्दा हिन्दुस्तानी शामिल हुए। सभी ने देश की आज़ादी के लिए तन, मन, धन न्योछावर करने का प्रण लिया। इन्हीं दिनों पंजाब के जलावतन देशभक्त भगवान सिंह वहाँ पहुँचे। धड़ाधड़ जलसे होने लगे, उपदेश होने लगे। काम से काम चलता गया। मैदान तैयार हो गया। फिर अख़बार की ज़रूरत महसूस होने लगी। ‘ग़दर’ नामक अख़बार निकाला गया। इसका प्रथम अंक नवम्बर 1913 में निकाला गया। इसके सम्पादकीय विभाग में कर्तार सिंह भी थे। आपकी क़लम में अथाह जोश था। सम्पादकीय विभाग के लोग अख़बार को हैण्ड प्रेस पर छापते थे। कर्तार सिंह क्रान्ति-पसन्द मतवाले नौजवान थे। प्रेस चलाते हुए थक जाने पर वे गीत गाया करते थे –
सेवा देश दी जिन्दड़िए बड़ी औखी,
गल्लाँ करनीआँ ढेर सुखल्लीयाँ ने।
जिन्नाँ देशसेवा विच पैर पाया,
उन्नाँ लक्ख मुसीबताँ झल्लियाँ ने।
(देशसेवा करनी बहुत मुश्किल है, जबकि बातें करना ख़ूब आसान है। जिन्होंने देशसेवा के रास्ते पर क़दम उठा लिया वे लाख मुसीबतें झेलते हैं।)
कर्तार सिंह जिस लगन से परिश्रम करते थे उससे सभी की हिम्मत बढ़ जाती थी। भारत को किस तरह आज़ाद कराया जाये, यह किसी और को पता चले या नहीं, और किसी ने इस सवाल पर सोचा हो या नहीं, लेकिन कर्तार सिंह ने इस सवाल पर बहुत कुछ सोच रखा था। इसी दौरान आप न्यूयार्क में विमान कम्पनी में भरती हो गये और वहीं दिल लगाकर काम सीखने लगे।
सितम्बर, 1914 में कामागाटामारू जहाज़ को अत्याचारी गोरे साम्राज्यवादियों के हाथ से अवर्णनीय यातनाएँ झेलने पर वैसे लौटना पड़ा। तब हमारे कर्तार सिंह, क्रान्तिप्रिय गुप्ता और एक अमेरिकी अराजकतावादी जैक को साथ लेकर जापान आये और कोबे में बाबा गुरदित्त सिंह जी से मिलकर सब बातचीत की। युगान्तर आश्रम, सानफ्रांसिस्को के ग़दर प्रेस में ‘ग़दर और ग़दर की गूँज’ और अन्य बहुत-सी पुस्तकें छापकर बाँटी जाती रहीं। दिनोदिन प्रचार बढ़ता गया। जोश बढ़ता गया। फ़रवरी, 1914 में स्टाकरन के पब्लिक जलसे में आज़ादी का झण्डा लहराया गया और आज़ादी और बराबरी के नाम पर क़समें खायी गयीं। इस जलसे के मुख्य वक्ताओं में कर्तार सिंह भी थे। सभी ने घोषणा की कि वह अपने ख़ून-पसीने की कमाई एक-एक कर देश की आज़ादी के संघर्ष में लगा देंगे। इसी तरह दिन गुज़रते रहे। अचानक यूरोप में प्रथम विश्वयुद्ध छिड़ने की ख़बर आयी। वे ख़ुशी से फूले नहीं समाते थे। एकदम सभी गाने लगे –
चलो चलें देश के लिए युद्ध करने,
यही आख़िरी वचन व फ़रमान हो गये।
कर्तार सिंह ने देश लौटने का ज़ोरों से प्रचार किया। फिर स्वयं जहाज़ पर सवार होकर कोलम्बो (श्रीलंका) पहुँच गये। इन दिनों अमेरिका से पंजाब आने वाले प्रायः डिफ़ेंस ऑफ़ इण्डिया क़ानून (डी.आई.आर.) की पकड़ में आ जाते थे। बहुत कम सही-सलामत पहुँच पाते थे। कर्तार सिंह सही-सलामत आ गये। बड़े ज़ोरों से काम शुरू हुआ। संगठन की कमी थी, लेकिन किसी तरह वह पूरी की गयी। दिसम्बर, 1914 में मराठा नौजवान विष्णु गणेश पिगले भी आ गये। इनकी कोशिश से श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल और रासबिहारी पंजाब आये। कर्तार सिंह हर समय हर जगह पहुँचते। आज मोगा में गुप्त मीटिग है। आप वहाँ भी हैं। कल लाहौर के विद्यार्थियों में प्रचार हो रहा है, आप फिर प्रथम पंक्ति में हैं। अगले दिन फ़िरोज़पुर छावनी के सैनिकों से गँठजोड़ हो रहा है। फिर हथियारों के लिए कलकत्ता जा रहे हैं। रुपये की कमी का प्रश्न उठने पर आपने डाका डालने की सलाह दी। डकैती का नाम सुनते ही बहुत-से लोग स्तम्भित रह गये, लेकिन आपने कह दिया कि कोई भय नहीं है। भाई परमानन्द भी डकैती से सहमत हैं। उनसे पुष्टि करवाने की ज़िम्मेदारी आप पर डाली गयी। अगले दिन बग़ैर उनसे मिले ही कह दिया, “पूछ आया हूँ, वे सहमत हैं।” वे यह सहन नहीं कर सकते थे कि केवल रुपये की कमी से विद्रोह की तैयारी में देरी हो।
एक दिन वे डकैती डालने एक गाँव गये। कर्तार सिंह नेता थे। डकैती चल रही थी। घर में एक बेहद ख़ूबसूरत लड़की भी थी। उसे देखकर एक पापी आत्मा का मन डोल गया। उसने ज़बरदस्ती लड़की का हाथ पकड़ लिया। लड़की ने घबराकर शोर मचा दिया। कर्तार सिंह एकदम रिवाल्वर तानकर उसके नज़दीक पहुँच गये और उस आदमी के माथे पर पिस्तौल रखकर उसे निहत्था कर दिया। फिर कड़ककर बोले, “पापी! तेरा अपराध बहुत गम्भीर है। तुम्हें सज़ा-ए-मौत मिलनी चाहिए, लेकिन हालात की मजबूरी से तुम्हें माफ़ किया जाता है। फ़ौरन इस लड़की के पाँवों में गिरकर माफ़ी माँग कि हे बहिन! मुझे माफ़ कर दो। और इसकी माता जी के पैर छूकर कह कि माता जी, मैं इस पतन के लिए माफ़ी चाहता हूँ। यदि वे तुम्हें माफ़ कर दें तो तुम्हें ज़िन्दा छोड़ दिया जायेगा वरना गोली से उड़ा दिया जायेगा।” उसने ऐसा ही किया। बात अभी ज़्यादा नहीं बढ़ी थी। यह देखकर माँ-बेटी की आँखें भर आयीं। माँ ने कर्तार सिंह को प्यार भरे लहजे में कहा, “बेटा! ऐसे धर्मात्मा और सुशील नौजवान होकर आप इस काम में किस तरह शामिल हुए?” कर्तार सिंह का भी दिल भर आया और कहा, “माँ जी! रुपये के लालच में हमने यह काम शुरू नहीं किया। अपना सबकुछ दाँव पर लगाकर डकैती डालने आये हैं। हथियार ख़रीदने के लिए रुपये की ज़रूरत है। वह कहाँ से लायें? माँ जी, इसी महान काम के लिए आज इस काम पर मजबूर हुए हैं।” इस समय पर यह दृश्य बड़ा दर्दनाक था। माँ ने फिर कहा, “इस लड़की की शादी करनी है। इसके लिए कुछ छोड़ जाओ तो अच्छा है।” इसके बाद उन्होंने अपना सारा धन माँ के सामने रख दिया और कहा, “जितना चाहें ले लें।” कुछ पैसा रखकर माँ ने बाक़ी सारा रुपया कर्तार सिंह की झोली में डाल दिया और आशीर्वाद दिया, “जाओ बेटा, तुम्हें सफलता मिले।” डकैती जैसे भयानक काम में शामिल होकर भी कर्तार सिंह का दिल कितना भावनामय, पवित्र व विशाल था, यह इस घटना से ज़ाहिर है।
फ़रवरी, 1915 में विद्रोह की तैयारी थी। पहले सप्ताह आप पिगले और दूसरे दो-तीन साथियों के साथ आगरा, कानपुर, इलाहाबाद, लखनऊ, मेरठ व अन्य कई स्थानों पर मत और विद्रोह के लिए उनसे मेल-मिलाप कर आये। आख़िर वह दिन क़रीब आने लगा, जिसका बड़ी देरी से इन्तज़ार हो रहा था। 21 फ़रवरी, 1915 भारत में विद्रोह का दिन नियत हुआ था। इसी के अनुसार तैयारी हो रही थी। लेकिन इसी समय उनकी आशाओं के वृक्ष की जड़ में बैठा एक चूहा उसे कुतर रहा था। चार-पाँच दिन पहले सन्देह हुआ कि किरपाल सिंह की ग़द्दारी से सब ध्वस्त हो जायेगा। इसी आशंका से कर्तार सिंह ने रासबिहारी बोस से विद्रोह की तारीख़ 21 की बजाय 19 फ़रवरी करने के लिए कहा। ऐसा होने पर भी इसकी भनक किरपाल सिंह को मिल गयी। इस क्रान्तिकारी दल में एक ग़द्दार का होना कितने ख़तरनाक परिणाम का कारण बना। रासबिहारी और कर्तार सिंह भी कोई उचित प्रबन्ध न होने से अपना भेद छिपा नहीं पाये। इसका कारण भारत के दुर्भाग्य के सिवाय और क्या हो सकता है?
कर्तार सिंह पिछले फ़ैसले के अनुसार पचास-साठ साथियों के साथ फ़िरोज़पुर जा पहुँचे। अपने साथी सैनिक हवलदार से मिले और विद्रोह की बात की। लेकिन किरपाल सिंह ने तो पहले से ही सारा मामला बिगाड़ दिया था। हिन्दुस्तानी सिपाही निहत्थे कर दिये गये। धड़ाधड़ गिरफ्तारियाँ होने लगीं। हवलदार ने सहायता करने से इन्कार कर दिया। कर्तार सिंह की कोशिश असफल रही। निराश हो लाहौर आये। पंजाबभर में गिरफ्तारियों का चक्कर तेज़ हो गया। अब साथी भी टूटने लगे। ऐसी स्थिति में रासबिहारी बोस मायूस होकर लाहौर के एक मकान में लेटे हुए थे। कर्तार सिंह भी वहीं आकर एक चारपाई पर दूसरी ओर मुँह फेर लेट गये। परस्पर कोई बात नहीं की, लेकिन चुपचाप ही एक-दूसरे के दिल की हालत समझ गये। इनकी हालत का अनुमान हम क्या लगा सकते हैं!
दरे-तदबीर पर सर फोड़ना शेवः रहा अपना,
वसीले हाथ ही ना आये क़िस्मत आज़माई के।
(हमारा काम भाग्य के दर पर सर फोड़ना ही रहा, लेकिन भाग्य आज़माने के साधन ही हाथ नहीं आये।)
उनकी तो यही ख़्वाहिश थी कि कहीं लड़ाई हो और वे अपने देश के लिए लड़ते-लड़ते प्राण दे दें। फिर सरगोधा के नज़दीक चक्क नम्बर पाँच में आ गये। फिर विद्रोह का चर्चा छेड़ दिया। वहीं पकड़े गये। ज़ंजीरों में जकड़े गये। निर्भीक विद्रोही कर्तार सिंह को लाहौर स्टेशन पर लाया गया। पुलिस कप्तान से कहा, “मिस्टर टामकिन, कुछ खाना तो लाइये।” वह कितना मस्त-मौला था। इस आकर्षक व्यक्तित्व को देखकर दोस्त व दुश्मन सब ख़ुश हो जाते थे। गिरफ्तारी के समय वे बहुत ख़ुश थे। प्रायः कहा करते थे, “वीरता और हिम्मत से मरने पर मुझे विद्रोही की उपाधि देना। कोई याद करे तो विद्रोही कर्तार सिंह कहकर याद करे।” मुक़दमा चला। उस समय कर्तार सिंह की आयु कुल साढ़े अठारह वर्ष थी। सबसे कम आयु के अपराधी आप ही थे, लेकिन जज ने इनके सम्बन्ध में यह लिखा –
“वह इन अपराधियों में, सबसे ख़तरनाक अपराधियों में एक है। अमेरिका की यात्रा के दौरान और फिर भारत में इस षड्यन्त्र का ऐसा कोई हिस्सा नहीं जिसमें उसने महत्त्वपूर्ण भूमिका न निभायी हो।”
एक दिन आपके बयान देने की बारी आयी। आपने सबकुछ मान लिया। आप क्रान्तिकारी बयान देते रहे। जज क़लम दाँतों के नीचे दबाये देखता रहा। एक शब्द न लिखा। बाद में इतना कहा, “कर्तार सिंह, अभी आपका बयान लिखा नहीं गया। आप सोच-समझकर बयान दें। आप जानते हैं कि आपके बयान का क्या परिणाम हो सकता है?” देखने वाले कहते हैं कि जज के इन शब्दों को कर्तार सिंह ने बड़ी मस्तानी अदा से केवल इतना कहा, “फाँसी ही तो चढ़ा देंगे, और क्या? हम इससे नहीं डरते।” इस दिन अदालत की कार्रवाई समाप्त हो गयी। अगले दिन फिर कर्तार सिंह का अदालत में बयान शुरू हुआ। पहले दिन जजों का कुछ ऐसा विचार था कि कर्तार सिंह भाई परमानन्द के इशारे पर ऐसा बयान दे रहे हैं, लेकिन वह विद्रोही कर्तार सिंह के दिल की गहराइयों में नहीं उतर सकते थे। कर्तार सिंह का बयान अधिक ज़ोरदार, अधिक जोशीला और पहले दिन की तरह ही इक़बालिया था। आख़िर में आपने कहा, “अपराध के लिए मुझे उम्रक़ैद की सज़ा मिलेगी या फाँसी। लेकिन मैं फाँसी को प्राथमिकता दूँगा, ताकि फिर जन्म लेकर – जब तक हिन्दुस्तान आज़ाद नहीं हो, तब तक मैं बार-बार जन्म लेकर – फाँसी पर लटकता रहूँगा। यही मेरी अन्तिम इच्छा है…”
आपकी वीरता से जज बहुत प्रभावित हुए, लेकिन उन्होंने विशाल दिलवाले दुश्मन की तरह आपकी वीरता को वीरता न कहकर बेशर्मी के शब्दों में याद किया। कर्तार सिंह को सिर्फ़ गालियाँ ही नहीं, मौत की सज़ा भी मिली। आपने मुस्कुराते हुए जजों को धन्यवाद दिया। कर्तार सिंह फाँसी की कोठरी में क़ैद थे। आपके दादा ने आकर कहा, “कर्तार सिंह, जिनके लिए मर रहे हो, वे तुम्हें गालियाँ देते हैं। तुम्हारे मरने से देश को कुछ लाभ होगा, ऐसा भी दिखायी नहीं देता।” कर्तार सिंह ने बहुत धीमे से पूछा –
“दादा जी, फलाँ रिश्तेदार कहाँ है?”
“प्लेग में मर गया।”
“फलाँ कहाँ है?”
“हैजे से मर गया।”
“तो क्या आप चाहते हैं कि कर्तार सिंह महीनों बिस्तर पर पड़ा रहे और पीड़ा से दुखी किसी रोग से मरे! क्या उस मौत से यह मौत हज़ार गुना अच्छी नहीं?” दादा चुप हो गये।
आज फिर सवाल उठता है कि उनके मरने से क्या लाभ हुआ? वह किसलिए मरे? इसका जवाब बिल्कुल स्पष्ट है। देश के लिए मरे। उनका आदर्श ही देश-सेवा के लिए लड़ते हुए मरना था। वे इससे ज़्यादा कुछ नहीं चाहते थे। मरना भी गुमनाम रहकर चाहते थे।
चमन ज़ारे मुहब्बत में, उसी ने बाग़बानी की,
जिसने मिहनत को ही मिहनत का समर जाना।
नहीं होता है मुहताजे नुमाइश फ़ैज़ शबनम का,
अँधेरी रात में मोती लुटा जाती है गुलशन में।
डेढ़ साल तक मुक़दमा चला। 16 नवम्बर, 1915 का दिन था, जब उन्हें फाँसी पर लटका दिया गया। उस दिन भी हमेशा की तरह ख़ुश थे। इनका वज़न दस पौण्ड बढ़ गया था। ‘भारतमाता की जय’ कहते हुए वे फाँसी के तख़्ते पर झूल गये।

भगतसिंह


ਲੈਨਿਨ ਦੀ ਬਰਸੀ ਉੱਤੇ ਟੈਲੀਗਰਾਮ – ਭਗਤ ਸਿੰਘ

[21 ਜਨਵਰੀ 1930 ਨੂੰ ਲਾਹੌਰ ਸਾਜ਼ਿਸ਼ ਕੇਸ ਦੇ ਅਰੋਪੀ ਲਾਲ ਰੁਮਾਲ ਬੰਨ ਕੇ ਅਦਾਲਤ ਵਿਚ ਪੇਸ਼ ਹੋਏ। ਜਿਸ ਵੇਲੇ ਹੀ ਮੈਜਿਸਟ੍ਰੇਟ ਆਪਣੀ ਕੁਰਸੀ ‘ਤੇ ਬੈਠਾ ਉਹਨਾਂ ਨੇ “ਸਮਾਜਵਾਦੀ ਇਨਕਲਾਬ ਜਿੰਦਾਬਾਦ”, “ਕਮੀਊਨਿਸਟ ਕੌਮਾਂਤਰੀ ਜਿੰਦਾਬਾਦ”, “ਅਵਾਮ ਜਿੰਦਾਬਾਦ”, “ਲੈਨਿਨ ਦਾ ਨਾਂਅ ਸਦਾ ਜਿਉਂਦਾ ਰਹੇਗਾ” ਅਤੇ “ਸਾਮਰਾਜਵਾਦ ਮੁਰਦਾਬਾਦ” ਦੇ ਨਾਅਰੇ ਲਾਉਣੇ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰ ਦਿੱਤੇ, ਤਦੇ ਭਗਤ ਸਿੰਘ ਨੇ ਅਦਾਲਤ ਵਿੱਚ ਆਪਣੇ ਟੈਲੀਗਰਾਮ ਵਾਲਾ ਪੱਤਰ ਪੜ੍ਹਿਆ ਅਤੇ ਜੱਜ ਨੂੰ ਇਹ ਟੈਲੀਗਰਾਮ ‘ਤੀਜੀ ਕੌਮਾਂਤਰੀ ਨੂੰ ਭੇਜਣ ਨੂੰ ਆਖਿਆ।]

ਲੈਨਿਨ-ਦਿਵਸ ਉੱਤੇ ਅਸੀਂ ਉਹਨਾਂ ਸਭ ਨੂੰ ਦਿਲੋਂ ਸ਼ਰਧਾਂਜਲੀ ਭੇਟ ਕਰਦੇ ਹਾਂ ਜਿਹੜੇ ਮਹਾਨ ਲੈਨਿਨ ਦੇ ਵਿਚਾਰਾਂ ਨੂੰ ਅੱਗੇ ਵਧਾਉਣ ਲਈ ਕੁੱਝ ਕਰ ਰਹੇ ਹਨ। ਅਸੀਂ ਰੂਸ ਵਿਚ ਚਲ ਰਹੇ ਮਹਾਨ ਪ੍ਰਯੋਗ ਦੀ ਸਫਲਤਾ ਦੀ ਕਾਮਨਾ ਕਰਦੇ ਹਨ। ਅਸੀਂ ਆਪਣੀ ਆਵਾਜ ਕਿਰਤੀਅਾਂ ਦੀ ਕੌਮਾਂਤਰੀ ਜਮਾਤੀ ਮੁਹਿੰਮ ਦੀ ਆਵਾਜ ਨਾਲ ਮਿਲਾਉਂਦੇ ਹਾਂ। ਪਰੋਲਤਾਰੀ ਦੀ ਜਿੱਤ ਅਟਲ ਹੈ, ਸਰਮਾਏਦਾਰੀ ਹਾਰੇਗੀ, ਸਾਮਰਾਜਵਾਦ ਦੀ ਮੌਤ ਹੋਵੇਗੀ।   



ਵਿਦਿਆਰਥੀ ਅਤੇ ਰਾਜਨੀਤੀ


ਬੜਾ ਭਾਰੀ ਰੌਲਾ ਇਸ ਗੱਲ ਦਾ ਸੁਣਿਆ ਜਾ ਰਿਹਾ ਹੈ ਕਿ ਪੜਨ ਵਾਲੇ ਨੌਜਵਾਨ (ਵਿਦਿਆਰਥੀ) ਰਾਜਸੀ ਕੰਮਾਂ ਵਿਚ ਹਿੱਸਾ ਨਾ ਲੈਣ। ਪੰਜਾਬ ਗਵਰਨਮੈਂਟ ਦਾ ਰੱਬ ਬਿਲਕੁਲ ਹੀ ਨਿਆਰਾ ਹੈ। ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ ਕੋਲੋਂ ਕਾਲਜਾਂ ਵਿਚ ਦਾਖਲ ਹੋਣ ਤੋਂ ਪਹਿਲੋਂ ਇਸ ਮਤਲਬ ਦੀ ਸ਼ਰਤ ਪੁਰ ਦਸਤਖਤ ਕਰਾਏ ਜਾਂਦੇ ਹਨ ਕਿ ਉਹ ਰਾਜਸੀ ਕੰਮਾਂ ਵਿਚ ਹਿੱਸਾ ਨਹੀਂ ਲਵੇਗਾ। ਅੱਗੇ ਤਕਦੀਰ ਸਾਡੀ ਫੁੱਟੀ ਹੋਈ, ਲੋਕਾਂ ਵੱਲੋਂ ਚੁਣਿਆਂ ਹੋਇਆ ਮਨੋਹਰ ਲਾਲ ਜੋ ਕਿ ਹੁਣ ਵਜ਼ੀਰੇ-ਤਾਲੀਮ ਬਣਿਆ ਹੋਇਆ ਹੈ, ਸਕੂਲਾਂ ਕਾਲਜਾਂ ਦੇ ਨਾਮ ਇੱਕ ਸਰਕੁਲਰ ਜਾਂ ਗਸ਼ਤੀ ਚਿੱਠੀ ਭੇਜਦਾ ਹੈ ਕਿ ਕੋਈ ਪੜ੍ਹਨ ਅਤੇ ਪੜ੍ਹਾਉਣ ਵਾਲਾ ਰਾਜਨੀਤੀ ਵਿਚ ਹਿੱਸਾ ਨਾ ਲੈ ਸਕੇ। ਕੁੱਝ ਦਿਨ ਹੋਏ ਹਨ ਜਦੋਂ ਕਿ ਲਾਹੌਰ ਵਿਚ ਸਟੂਡੈਂਟਸ ਯੂਨੀਅਨ ਜਾਂ ਵਿਦਿਆਰਥੀ ਜਥੇਬੰਦੀ ਵੱਲੋਂ ਵਿਦਿਆਰਥੀ ਹਫ਼ਤਾ ਮਨਾਇਆ ਜਾ ਰਿਹਾ ਸੀ। ਉੱਥੇ ਵੀ ਸਰ ਅਬਦੁਲ ਕਾਦਰ ਅਤੇ ਸ਼੍ਰੀਮਾਨ ਪ੍ਰੋਫੈਸਰ ਈਸ਼ਵਰ ਚੰਦਰ ਨੰਦਾ ਨੇ ਇਸ ਗੱਲ ਤੇ ਜ਼ੋਰ ਦਿੱਤਾ ਕਿ ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ ਨੂੰ ਰਾਜਨੀਤੀ ਵਿਚ ਹਿੱਸਾ ਨਹੀਂ ਲੈਣਾ ਚਾਹੀਦਾ।
              ਪੰਜਾਬ ਰਾਜਸੀ ਮੈਦਾਨ ਵਿਚ ਸਭ ਤੋਂ ਨਖਿੱਧ (Politically Backward) ਕਹਾਉਂਦਾ ਹੈ। ਇਸ ਦੀ ਕੀ ਵਜ੍ਹਾ ਹੈ? ਕੀ ਪੰਜਾਬ ਨੇ ਕੁਰਬਾਨੀਆਂ ਘੱਟ ਦਿੱਤੀਆਂ ਹਨ? ਕੀ ਪੰਜਾਬ ਨੇ ਮੁਸੀਬਤਾਂ ਘੱਟ ਝੱਲੀਆਂ ਹਨ? ਫਿਰ ਵੀ ਕੀ ਵਜ੍ਹਾ ਹੈ ਕਿ ਅਸੀਂ ਇਸ ਮੈਦਾਨ ਵਿਚ ਸਭ ਤੋਂ ਪਿੱਛੇ ਹਾਂ? ਇਸ ਦੀ ਵਜ੍ਹਾ ਸਾਫ ਹੈ ਕਿ ਸਾਡੀ ਤਾਲੀਮ ਯਾਫਤਾ (ਉੱਚ ਵਿੱਦਿਆ ਪ੍ਰਾਪਤ) ਲੋਕੀਂ ਬਿਲਕੁਲ ਹੀ ਬੁੱਧੂ ਹਨ ਅੱਜ ਪੰਜਾਬ ਕੌਂਸਲ ਦੀ ਕਾਰਵਾਈ ਪੜ੍ਹ ਕੇ ਇਸ ਗੱਲ ਦਾ ਚੰਗੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਪਤਾ ਲੱਗਦਾ ਹੈ ਇਸ ਦਾ ਕਾਰਨ ਇਹੋ ਹੈ ਕਿ ਸਾਡੀ ਤਾਲੀਮ ਨਿਕੰਮੀ ਅਤੇ ਫਜ਼ੂਲ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ਅਤੇ ਵਿਦਿਆਰਥੀ ਦੁਨੀਆ ਛੱਡ ਕੇ ਆਪਣੇ ਮੁਲਕ ਦੀਆਂ ਗੱਲਾਂ ਵਿਚ ਕੋਈ ਹਿੱਸਾ ਨਹੀਂ ਲੈਂਦੇ। ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਇਸ ਦੇ ਸੰਬੰਧ ਵਿਚ ਕੁੱਝ ਵੀ ਗਿਆਨ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ।
              ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਨੇ ਕੱਲ੍ਹ ਨੂੰ ਮੁਲਕ ਦੀ ਵਾਗਡੋਰ ਹੱਥ ਵਿਚ ਲੈਣੀ ਹੈ ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਹੀ ਅੱਜ ਅਕਲ ਦੇ ਅੰਨ੍ਹੇ ਬਣਾਏ ਜਾਣ ਦੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕੀਤੀ ਜਾ ਰਹੀ ਹੈ ਤੇ ਜੋ ਨਤੀਜਾ ਨਿਕਲੇਗਾ, ਉਹ ਸਾਨੂੰ ਆਪ ਹੀ ਸਮਝ ਲੈਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ। ਇਹ ਅਸੀਂ ਮੰਨਦੇ ਹਾਂ ਕਿ ਵਿਦਿਆਰਥੀ ਦਾ ਮੁੱਖ ਕੰਮ ਵਿੱਦਿਆ ਪੜ੍ਹਨਾ ਹੈ। ਉਸ ਨੂੰ ਆਪਣੀ ਸਾਰੀ ਤਵੱਜੋ ਉਸੇ ਪਾਸੇ ਲਾ ਦੇਣੀ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ। ਪਰ ਕੀ ਦੇਸ਼ ਦੇ ਹਾਲਾਤ ਦਾ ਗਿਆਨ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਸੁਧਾਰ ਦੇ ਉਪਾਅ ਸੋਚਣ ਦੀ ਯੋਗਤਾ ਪੈਦਾ ਕਰਨਾ ਉਸੇ ਵਿੱਦਿਆ ਵਿਚ ਸ਼ਾਮਿਲ ਨਹੀਂ? ਜੇ ਨਹੀਂ ਤਾਂ ਅਸੀਂ ਉਸ ਵਿੱਦਿਆ ਨੂੰ ਨਿਕੰਮਾ ਸਮਝਦੇ ਹਾਂ ਜੋ ਕਿ ਕੇਵਲ ਕਲਰਕੀ ਕਰਨ ਵਾਸਤੇ ਹੀ ਹਾਸਿਲ ਕੀਤੀ ਜਾਵੇ। ਐਸੀ ਵਿੱਦਿਆ ਦੀ ਲੋੜ ਹੀ ਕੀ ਹੈ? ਕੁੱਝ ਜ਼ਿਆਦਾ ਚਲਾਕ ਆਦਮੀ ਇਹ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ:
              ”ਕਾਕਾ! ਤੁਸੀਂ ਰਾਜਨੀਤੀ ਦੇ ਮੁਤੱਲਕ, ਪੜ੍ਹੋ ਤੇ ਸੋਚੋ ਜ਼ਰੂਰ, ਪਰ ਕੋਈ ਅਮਲੀ ਹਿੱਸਾ ਨਾ ਲਵੋ। ਕਿਉਂਕਿ ਤੁਸੀਂ ਜਿਆਦਾ ਲਾਇਕ ਹੋ ਕੇ ਦੇਸ਼ ਦੇ ਵਾਸਤੇ ਫਾਇਦੇਮੰਦ ਸਾਬਤ ਹੋਵੋਗੇ।” ਗੱਲ ਬੜੀ ਸੋਹਣੀ ਲੱਗਦੀ ਹੈ। ਪਰ ਅਸੀਂ ਦੱਸਦੇ ਹਾਂ ਕਿ ਇਹ ਵੀ ਕੇਵਲ ਓਪਰੀ-ਓਪਰੀ ਹੀ ਗੱਲ ਹੈ। ਇਸ ਗੱਲ ਤੋਂ ਇਹ ਸਾਫ ਜ਼ਾਹਿਰ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਕਿ ਇੱਕ ਦਿਨ ਇੱਕ ਵਿਦਿਆਰਥੀ ਇੱਕ ਕਿਤਾਬ ”ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਦੇ ਨਾਮ ਅਪੀਲ” ਵੱਲੋਂ ਕ੍ਰੌਪਟਿਨ (”Appeal to the Young” by Peter Kropotkin) ਪੜ੍ਹ ਰਿਹਾ ਸੀ। ਇੱਕ ਪ੍ਰੋਫੈਸਰ ਸਾਹਿਬ ਕਹਿਣ ਲੱਗੇ, ਇਹ ਕੀ ਕਿਤਾਬ ਹੈ? ਅਤੇ ਇਹ ਤਾਂ ਕਿਸੇ ਬੰਗਾਲੀ ਦਾ ਨਾਮ ਜਾਪਦਾ ਹੈ। ਮੁੰਡਾ ਹੱਸ ਪਿਆ। ਪ੍ਰਿੰਸ ਕੌਪਟਕਿਨ ਦਾ ਨਾਮ ਬੜਾ ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਹੈ। ਉਹ ਅਰਥ ਸ਼ਾਸਤਰ ਦੇ ਵਿਸ਼ੇ ਦੇ ਖਾਸ ਵਿਦਵਾਨ ਸਨ। ਆਪ ਦੇ ਨਾਮ ਤੋਂ ਵਾਕਫ਼ ਹੋਣਾ ਹਰ ਇੱਕ ਪ੍ਰੋਫੈਸਰ ਨੂੰ ਬੜਾ ਜ਼ਰੂਰੀ ਸੀ। ਪਰ ਪ੍ਰੋਫੈਸਰ ਦੀ ਲਿਆਕਤ ‘ਤੇ ਮੁੰਡਾ ਹੱਸ ਪਿਆ ਤੇ ਉਸ ਕਿਹਾ: ਕਿ ਜੀ ਇਹ ਤਾਂ ਰੂਸੀ ਸੱਜਣ ਸਨ। ਬੱਸ! ”ਰੂਸੀ”? ਹੋਇਆ ਕਹਿਰ! ਝੱਟ ਪ੍ਰੋਫੈਸਰ ਨੇ ਕਹਿ ਦਿੱਤਾ ਕਿ ਤੂੰ ਤਾਂ ਬਾਲਸ਼ਵਿਕ ਹੈ, ਕਿਉਂਕਿ ਤੂੰ ਪੁਲਿਟੀਕਲ ਕਿਤਾਬਾਂ ਪੜ੍ਹਦਾ ਹੈ। ਮੈਂ ਹੁਣੇ ਹੀ ਪ੍ਰਿੰਸੀਪਲ ਨੂੰ ਕਹਿੰਦਾ ਹਾਂ। ਦੇਖੋ ਤੁਸੀਂ ਪ੍ਰੋਫੈਸਰ ਦੀ ਲਿਆਕਤ। ਹੁਣ ਉਹਨਾਂ ਮੁੰਡਿਆਂ ਵਿਚਾਰਿਆਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਕੋਲ਼ੋਂ ਕੀ ਸਿੱਖਣਾ ਹੈ? ਐਸੀ ਹਾਲਤ ਵਿਚ ਉਹ ਨੌਜਵਾਨ ਕੀ ਸਿੱਖ ਸਕਦੇ ਹਨ।
              ਅਤੇ ਦੂਜੀ ਗੱਲ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਅਮਲੀ ਪਾਲਿਟਿਕਸ ਕੀ ਹੁੰਦਾ ਹੈ? ਮਹਾਤਮਾ ਗਾਂਧੀ, ਜਵਾਹਰ ਲਾਲ ਨਹਿਰੂ ਅਤੇ ਸੁਭਾਸ਼ ਚੰਦਰ ਬੋਸ ਦਾ ਸਵਾਗਤ ਕਰਨਾ ਅਤੇ ਲੈਕਚਰ ਸੁਣਨਾ ਤੇ ਹੋਇਆ ਨਾ ਅਮਲੀ ਪਾਲਿਟਿਕਸ। ਤੇ ਕਮਿਸ਼ਨ ਜਾਂ ਵਾਇਸਰਾਏ ਦਾ ਸਵਾਗਤ ਕਰਨਾ ਕੀ ਹੋਇਆ? ਕੀ ਉਹ ਪਾਲਿਟਿਕਸ ਦਾ ਹੀ ਦੂਜਾ ਪਹਿਲੂ ਨਹੀਂ? ਸਰਕਾਰਾਂ ਅਤੇ ਮੁਲਕਾਂ ਦੇ ਇੰਤਜ਼ਾਮਾਂ ਦੇ ਮੁਤੱਲਕ (ਸਬੰਧੀ) ਕੋਈ ਵੀ ਗੱਲ ਪਾਲਿਟਿਕਸ ਦੇ ਮੈਦਾਨ ਵਿਚ ਹੀ ਗਿਣੀ ਜਾਵੇਗੀ। ਤਾਂ ਫਿਰ ਇਹ ਵੀ ਪਾਲਿਟਿਕਸ ਹੋਇਆ ਕਿ ਨਾ? ਕਿਹਾ ਜਾਵੇਗਾ ਕਿ ਇਸ ਤੋਂ ਸਰਕਾਰ ਖੁਸ਼ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ਤੇ ਦੂਜੇ ਤੋਂ ਨਰਾਜ਼? ਤੇ ਫਿਰ ਸਵਾਲ ਤਾਂ ਸਰਕਾਰ ਦੀ ਖੁਸ਼ੀ ਤੇ ਨਰਾਜ਼ਗੀ ਦਾ ਹੋਇਆ। ਕੀ ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ ਨੂੰ ਜੰਮਦਿਆਂ ਹੀ ਖੁਸ਼ਾਮਦ ਦਾ ਸਬਕ ਪੜ੍ਹਾਇਆ ਜਾਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ? ਅਸੀਂ ਤੇ ਸਮਝਦੇ ਹਾਂ ਕਿ ਜਦੋਂ ਤੀਕ ਹਿੰਦੁਸਤਾਨ ਵਿਚ ਵਿਦੇਸ਼ੀ ਡਾਕੂ ਹਕੂਮਤ ਕਰ ਰਹੇ ਹਨ ਤੋਂ ਤੀਕ ਵਫ਼ਾਦਾਰੀ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਵਫ਼ਾਦਾਰ ਨਹੀਂ ਬਲਕਿ ਗੱਦਾਰ ਹਨ, ਇਨਸਾਨ ਨਹੀਂ ਪਸ਼ੂ ਹਨ, ਪੇਟ ਦੇ ਗੁਲਾਮ ਹਨ। ਤਾਂ ਅਸੀਂ ਕਿਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਕਹੀਏ ਕਿ ਵਿਦਿਆਰਥੀ ਵਫ਼ਾਦਾਰੀ ਦਾ ਸਬਕ ਸਿੱਖਣ।
              ਸਾਰੇ ਹੀ ਮੰਨਦੇ ਹਨ ਕਿ ਹਿੰਦੁਸਤਾਨ ਨੂੰ ਇਸ ਵੇਲੇ ਦੇਸ਼ ਸੇਵਕਾਂ ਦੀ ਲੋੜ ਹੈ, ਜੋ ਤਨ ਮਨ ਧਨ ਦੇਸ਼ ਤੋਂ ਵਾਰ ਦੇਣ ਅਤੇ ਪਾਗਲਾਂ ਵਾਂਗ ਸਾਰੀ ਉਮਰ ਦੇਸ਼ ਦੀ ਆਜ਼ਾਦੀ ਦੀ ਖਾਤਰ ਨਿਛਾਵਰ ਕਰ ਦੇਣ। ਪਰ ਕੀ ਬੁੱਢਿਆਂ ਵਿਚੋਂ ਵੀ ਇਹੋ ਜਿਹੇ ਆਦਮੀ ਮਿਲ ਸਕਣਗੇ? ਕੀ ਟੱਬਰਾਂ ਦੇ ਤੇ ਦੁਨੀਆਦਾਰੀ ਦੇ ਟੰਟਿਆਂ ਵਿਚ ਫਸੇ ਹੋਏ ਸਿਆਣੇ ਲੋਕਾਂ ਵਿਚੋਂ ਇਹੋ ਜਿਹੇ ਨਿਕਲ ਸਕਣਗੇ? ਇਹ ਤਾਂ ਉਹ ਨੌਜਵਾਨ ਹੀ ਨਿਕਲ ਸਕਦੇ ਹਨ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਕੋਈ ਜੰਜਾਲ ਨਾ ਪਏ ਹੋਏ ਹੋਣ ਅਤੇ ਜੰਜਾਲਾਂ ਵਿਚ ਪੈਣ ਤੋਂ ਪਹਿਲੋਂ ਵਿਦਿਆਰਥੀ ਜਾਂ ਹੋਰ ਨੌਜਵਾਨ ਤਦੇ ਹੀ ਸੋਚ ਸਕਦੇ ਹਨ ਜੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਕੁੱਝ ਅਸਲੀ ਇਲਮ ਵੀ ਹਾਸਿਲ ਕੀਤਾ ਹੋਵੇ। ਨਿਰੇ ਹਿਸਾਬ ਤੇ ਜੁਗਰਾਫ਼ੀਏ ਨੂੰ ਹੀ ਇਮਤਿਹਾਨ ਦੇ ਪਰਚਿਆਂ ਵਾਸਤੇ ਘੋਟੇ ਨਾ ਲਾਏ ਹੋਏ ਹੋਣ।
              ਕੀ ਇੰਗਲੈਂਡ ਦੇ ਸਾਰੇ ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ ਦਾ ਕਾਲਜ ਛੱਡ ਕੇ ਜਰਮਨੀ ਦੇ ਬਰਖ਼ਿਲਾਫ ਲੜਨ ਤੁਰ ਜਾਣਾ ਪਾਲਿਟਿਕਸ ਨਹੀਂ ਸੀ? ਓਦੋਂ ਸਾਡੇ ਉਪਦੇਸ਼ਕ ਕਿੱਥੇ ਸਨ? ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਕਹਿੰਦੇ ਕਿ ਜਾਓ ਜਾ ਕੇ ਹਾਲੇ ਵਿੱਦਿਆ ਹਾਸਿਲ ਕਰੋ। ਅੱਜ ਕੌਮੀ ਕਾਲਜ ਅਹਿਮਦਾਬਾਦ ਦੇ ਜੋ ਲੜਕੇ ਸੱਤਿਆਗ੍ਰਹਿ ਵਿਚ ਬਾਰਦੌਲੀ ਵਾਲਿਆਂ ਦੀ ਸਹਾਇਤਾ ਕਰ ਰਹੇ ਹਨ, ਕੀ ਉਹ ਐਵੇਂ ਮੂਰਖ ਹੀ ਰਹਿ ਜਾਣਗੇ? ਦੇਖਾਂਗੇ ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਮੁਕਾਬਲੇ ਵਿਚ ਪੰਜਾਬ ਦੀ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਕਿੰਨੇ ਕੁ ਲਾਇਕ ਆਦਮੀ ਪੈਦਾ ਕਰਦੀ ਹੈ। ਸਾਰੇ ਹੀ ਮੁਲਕਾਂ ਨੂੰ ਆਜ਼ਾਦ ਕਰਾਉਣ ਵਾਲੇ ਉੱਥੋਂ ਦੇ ਵਿਦਿਆਰਥੀ ਅਤੇ ਨੌਜਵਾਨ ਹੀ ਹੋਇਆ ਕਰਦੇ ਹਨ। ਕੀ ਹਿੰਦੁਸਤਾਨ ਦੇ ਨੌਜਵਾਨ ਵੱਖਰੇ ਰਹਿ ਕੇ ਆਪਣੀ ਅਤੇ ਆਪਣੇ ਦੇਸ਼ ਦੀ ਹਸਤੀ ਬਚਾ ਸਕਣਗੇ? ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਨੂੰ 1919 ਵਿਚ ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ ਤੇ ਢਾਹੇ ਗਏ ਜ਼ੁਲਮ ਭੁੱਲ ਨਹੀਂ ਸਕਦੇ। ਉਹ ਇਹ ਵੀ ਸਮਝਦੇ ਹਨ ਕਿ ਇੱਕ ਭਾਰੀ ਇਨਕਲਾਬ ਦੀ ਜ਼ਰੂਰਤ ਹੈ। ਉਹ ਪੜ੍ਹਨ ਜ਼ਰੂਰ ਪੜ੍ਹਨ! ਨਾਲ ਹੀ ਪਾਲਿਟਿਕਸ ਦਾ ਵੀ ਗਿਆਨ ਹਾਸਿਲ ਕਰਨ, ਅਤੇ ਜਦੋਂ ਜ਼ਰੂਰਤ ਆ ਪਵੇ ਉਦੋਂ ਮੈਦਾਨ ਵਿਚ ਆ ਕੁੱਦਣ ਅਤੇ ਆਪਣੀਆਂ ਜ਼ਿੰਦਗੀਆਂ ਇਸੇ ਕੰਮ ਵਿਚ ਲਾ ਦੇਣ। ਆਪਣੀਆਂ ਜਾਨਾਂ ਇਸੇ ਕੰਮ ਵਿਚ ਦੇ ਦੇਣ! ਵਰਨਾ ਕੋਈ ਬਚਣ ਦਾ ਉਪਾਅ ਨਜ਼ਰ ਨਹੀਂ ਆਉਂਦਾ।

  ਭਗਤ ਸਿੰਘ


ਅਛੂਤ ਦਾ ਸਵਾਲ – ਭਗਤ ਸਿੰਘ

ਸਾਡੇ ਮੁਲਕ ਜਿੰਨੀ ਭੈੜੀ ਹਾਲਤ ਹੋਰ ਕਿਸੇ ਮੁਲਕ ਦੀ ਨਹੀਂ ਹੋਣੀ। ਇੱਥੇ ਅਜੀਬ ਤੋਂ ਅਜੀਬ ਸਵਾਲ ਪੈਦਾ ਹੋਏ ਹਨ। ਇੱਕ ਬੜਾ ਭਾਰੀ ਸਵਾਲ ਅਛੂਤ ਦਾ ਸਵਾਲ ਹੈ। ਸਵਾਲ ਇਹ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਕਿ ਤੀਹ ਕਰੋੜ ਦੀ ਅਬਾਦੀ ਵਾਲੇ ਮੁਲਕ ਵਿਚ 6 ਕਰੋੜ ਆਦਮੀ ਜੋ ਅਛੂਤ ਕਹਾਉਂਦੇ ਹਨ, ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਛੁਹ ਲੈਣ ਨਾਲ ਧਰਮ ਭ੍ਰਿਸ਼ਟ ਤਾਂ ਨਾ ਹੋਵੇਗਾ? ਕੀ ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਮੰਦਰਾਂ ਵਿਚ ਜਾਣ ਦੇਣ ਨਾਲ ਦੇਵਤੇ ਨਾਰਾਜ਼ ਤੇ ਨਾ ਹੋ ਜਾਣਗੇ? ਕੀ ਉਹਨਾਂ ਵਲੋਂ ਖੂਹ ਵਿਚੋਂ ਪਾਣੀ ਕੱਢ ਲੈਣ ਨਾਲ ਖੂਹ ਪਲੀਤ ਤੇ ਨਹੀਂ ਹੋ ਜਾਵੇਗਾ? ਇਹ ਸਵਾਲ ਵੀਹਵੀਂ ਸਦੀ ਵਿਚ ਕੀਤੇ ਜਾ ਰਹੇ ਹਨ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਸੁਣਦਿਆਂ ਹੀ ਸ਼ਰਮ ਆਉਂਦੀ ਹੈ।
       ਸਾਡਾ ਮੁਲਕ ਬੜਾ ਹੀ ਅਧਿਆਤਮਵਾਦੀ ਹੈ ਯਾਨੀ ਰੂਹਾਨਿਯਤ ਪਸੰਦ ਹੈ। ਅਸੀਂ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ ਮਨੁੱਖ ਦਾ ਦਰਜਾ ਦੇਣੋਂ ਵੀ ਝਕਦੇ ਹਾਂ, ਤੇ ਉਹ ਬਿਲਕੁੱਲ ਹੀ ਮਾਇਆਵਾਦੀ ਕਹਾਉਣ ਵਾਲਾ ਯੂਰਪ ਕਈ ਸਦੀਆਂ ਤੋਂ ਇੱਕਮਈ ਦਾ ਸ਼ੋਰ ਮਚਾ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਉਨਾਂ ਨੇ Equality (ਬਰਾਬਰੀ) ਦਾ ਐਲਾਨ ਅਮਰੀਕਾ ਅਤੇ ਫ਼ਰਾਂਸ ਦੇ ਇਨਕਲਾਬ ਵਿਚ ਹੀ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਸੀ ਤੇ ਅੱਜ ਰੂਸ ਨੇ ਹੋਰ ਵੀ ਕਿਸੇ ਕਿਸਮ ਦਾ ਭਿੰਨ ਭੇਦ ਮਿਟਾਉਣ ਦੀ ਖਾਤਰ ਇੱਕਮਈ ਦੇ ਅਸੂਲ ‘ਤੇ ਲੱਕ ਬੱਧਾ ਹੋਇਆ ਹੈ ਤੇ ਅਸੀਂ ਅਸੀਂ ਸਦਾ ਹੀ ਆਤਮਾ ਪ੍ਰਮਾਤਮਾਂ ਦੇ ਹੀ ਰੋਣੇ ਰੋਣ ਵਾਲੇ ਅੱਜ ਵੀ ਇਸ ਗੱਲ ‘ਤੇ ਉੱਤੇ ਜੋਰ ਨਾਲ ਬਹਿਸਾਂ ਕਰਕੇ ਕਿ ਕੀ ਅਛੂਤਾਂ ਨੂੰ ਜਨੇਊ ਦੇ ਦਿੱਤਾ ਜਾਵੇਗਾ, ਕੀ ਉਹ ਵੇਦ ਸ਼ਾਸ਼ਤਰ ਪੜ੍ਹਨ ਦੇ ਹੱਕਦਾਰ ਹਨ ਕਿ ਨਹੀਂ! ਅਸੀਂ ਨਾ ਮਨਜ਼ੂਰ ਕਰ ਦਿੰਦੇ ਹਾਂ ਅਤੇ ਸਾਨੂੰ ਸ਼ਿਕਾਇਤ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਦੂਜੇ ਦੇਸ਼ਾਂ ਵਿਚ ਸਾਡੇ ਨਾਲ ਚੰਗਾ ਸਲੂਕ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ। ਗੋਰੇਸ਼ਾਹੀ ਵਿਚ ਸਾਨੂੰ ਗੋਰੇ ਬਰਾਬਰ ਨਹੀਂ ਸਮਝਿਆ ਜਾਂਦਾ ਸਾਨੂੰ ਇਹ ਸ਼ਿਕਾਇਤ ਕਰਨ ਦਾ ਹੱਕ ਹੀ ਕੀ ਹੈ?
ਸਿੰਧ ਦੇ ਇੱਕ ਮੁਸਲਮਾਨ ਸੱਜਣ, ਮਿ. ਨੂਰ ਮੁਹੰਮਦ, ਮੈਂਬਰ ਬੰਬਈ ਕੌਂਸਲ ਨੇ ਇਸ ਮਸਲੇ ਬਾਰੇ 1926 ਵਿਚ ਖੂਬ ਕਿਹਾ ਸੀ :-
“if the Hindu Society refuses to allow other human beings, fellow creatures so that to attend public schools, and if….the president of local board representing so many lakhs of people in this house refuses to ’allow his fellows and brothers the elementary human right of having water to drink, what right have they to ask for more rights from the bureaucracy?Before we accuse people coming from other lands, we should see how we ourselves behave toward our own people… .How can we ask for greater political rights when we ourselves deny elementary rights of human beings.”

      ਉਹ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਜਦੋਂ ਤੁਸੀਂ ਇੱਕ ਇਨਸਾਨ ਨੂੰ ਪੀਣ ਵਾਲਾ ਪਾਣੀ ਦੇਣ ਤੋਂ ਵੀ ਇਨਕਾਰੀ ਹੋ ਜਾਂ, ਜਦੋਂ ਤੁਸੀਂ ਉਨਾਂ ਨੂੰ ਮਦਰਸੇ ਵਿਚ ਪੜ੍ਹਨ ਵੀ ਨਹੀਂ ਦੇਂਦੇ, ਤਾਂ ਤੁਹਾਡਾ ਕੀ ਹੱਕ ਬਣਦਾ ਹੈ ਕਿ ਆਪਣੇ ਵਾਸਤੇ ਹੋਰ ਹੱਕੂਕ (ਹੱਕ) ਮੰਗੋ? ਜਦੋਂ ਤੁਸੀਂ ਇੱਕ ਇਨਸਾਨ ਦੇ ਸਾਧਰਨ ਅਧਿਕਾਰ ਦੇਣ ਤੋਂ ਵੀ ਇਨਕਾਰੀ ਹੋ, ਤਾਂ ਤੁਸੀਂ ਹੋਰ ਪੁਲੀਟੀਕਲ ਹੱਕ ਮੰਗਣ ਦੇ ਅਧਿਕਾਰੀ ਕਿਵੇਂ ਬਣ ਗਏ?ਗੱਲ ਬੜੀ ਸੱਚੀ ਹੈ, ਪਰ ਚੂੰਕਿ ਇੱਕ ਮੁਸਲਮਾਨ ਨੇ ਇਹ ਗੱਲ ਕਹੀ ਹੈ,ਇਸ ਵਾਸਤੇ ਹਿੰਦੂ ਇਹ ਕਹਿਣ ਲੱਗ ਪੈਂਦੇ ਹਨ, ਦੇਖੋ ਜੀ, ਉਹ ਉਹਨਾਂ ਅਛੂਤਾਂ ਨੂੰ ਮੁਸਲਮਾਨ ਬਣਾ ਕੇ ਆਪਣੇ ਵਿੱਚ ਰਲਾਉਣਾ ਚਾਹੁੰਦੇ ਹਨ। ਉਹਨਾਂ ਤੇ ਸਾਫ ਮੰਨ ਲਿਆ ਹੈ ਕਿ ਜਦੋਂ ਤੁਸੀ ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਇਸ ਤਰਾਂ ਪਸ਼ੂਆਂ ਨਾਲੋਂ ਵੀ ਗਿਆ ਗੁਜ਼ਾਰਿਆ ਸਮਝੋਗੇ ਤੇ ਉਹ ਜਰੂਰ ਹੀ ਦੂਜੇ ਮਜ੍ਹਬਾਂ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਹੋਣਗੇ। ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਉਨਾਂ ਨੂੰ ਵਧੇਰੇ ਅਧਿਕਾਰ ਮਿਲਣਗੇ, ਜਿੱਥੇ ਕਿ ਉਹਨਾਂ ਨਾਲ ਆਦਮੀਆਂ ਵਰਗਾ ਸਲੂਕ ਕੀਤਾ ਜਾਵੇਗਾ। ਫਿਰ ਇਹ ਕਹਿਣਾ ਕਿ ਦੇਖੋ ਜੀ ਈਸਾਈ ਅਤੇ ਮੁਸਲਮਾਨ ਹਿੰਦੂ ਕੌਮ ਨੂੰ ਨੁਕਸਾਨ ਪਹੁੰਚਾ ਰਹੇ ਹਨ, ਫਜ਼ੂਲ ਹੋਵੇਗਾ।
       ਕਿੰਨੀ ਸੱਚੀ ਗੱਲ ਹੈ, ਪਰ ਇਹ ਸੁਣ ਕੇ ਸਾਰੇ ਤੜਪ ਉਠੱਦੇ ਹਨ। ਖੈਰ ! ਠੀਕ ਏਸੇ ਗੱਲ ਦਾ ਫਿਕਰ ਹਿੰਦੂਆਂ ਨੂੰ ਵੀ ਪਿਆ। ਸਨਾਤਨੀ ਪੰਡਤ ਵੀ ਇਸ ਮਸਲੇ ‘ਤੇ ਸੋਚਾਣ ਲੱਗੇ। ਵਿਚ-ਵਿਚ ਵੱਡੇ “ਯੁੱਗ ਪਲਟਾਊ’ ਕਹਾਉਣ ਵਾਲੇ ਵੀ ਸ਼ਾਮਿਲ ਹੋਏ। ਪਟਨਾ ਵਿਚ ਹਿੰਦੂ ਮਹਾਂਸਭਾ ਹੋਈ। ਲਾਲਾ ਲਾਜਪਾਤ ਰਾਏ, ਜਿਹੜੇ ਕਿ ਅਛੂਤਾਂ ਦੇ ਬੜੇ ਪੁਰਾਣੇ ਹਮਾਇਤੀ ਚਲੇ ਆਉਂਦੇ ਹਨ, ਪ੍ਰਧਾਨ ਸਨ। ਬੜੀ ਬਹਿਸ ਛਿੜੀ, ਗਰਮਾ-ਗਰਮ ਝੜਪਾਂ ਹੋਈਆਂ, ਮਾਮਲਾ ਇਹ ਦਰਪੇਸ਼ ਸੀ ਕਿ ਕੀ ਅਛੂਤਾਂ ਨੂੰ ਯਗੋ-ਪਵੀਤ (ਜਨੇਊ) ਪਾਉਣ ਦਾ ਹੱਕ ਹੈ? ਤੇ ਕੀ ਉਨਾਂ ਨੂੰ ਵੇਦ ਸ਼ਾਸਤਰ ਪੜ੍ਹਨ ਦਾ ਹੱਕ ਹੈ? ਬੜੇ-ਬੜੇ Reformer (ਸਮਾਜ ਸੁਧਾਰਕ) ਗਰਮ ਹੋ ਪਏ, ਪਰ ਲਾਲਾ ਜੀ ਨੇ ਸਾਰਿਆਂ ਨੂੰ ਸਮਝਾ ਲਿਆ ਅਤੇ ਇਹ ਦੋਵੇਂ ਗੱਲਾਂ ਮਨਜੂਰ ਕਰ ਕੇ ਹਿੰਦੂ ਧਰਮ ਦੀ ਲਾਜ ਰੱਖ ਲਈ। ਨਹੀਂ ਤਾਂ ਕਿੱਥੇ ਠਿਕਾਣਾ ਸੀ, ਜਰਾ ਸੋਚੋ ਤਾਂ ਸਹੀ ਕਿੱਡੀ ਸ਼ਰਮ ਦੀ ਗੱਲ ਹੈ। ਕੁੱਤਾ ਸਾਡੀ ਗੋਦ ਵਿਚ ਬੈਠ ਸਕਦਾ ਹੈ, ਸਾਡੇ ਚੌਂਕੇ ਵਿੱਚ ਨਿਸ਼ੰਗ ਫਿਰ ਸਕਦਾ ਹੈ, ਪਰ ਇੱਕ ਪਰ ਇੱਕ ਆਦਮੀ ਸਾਡੇ ਨਾਲ ਛੂਹ ਜਾਵੇ ਤਾਂ ਬੱਸ ਧਰਮ ਖਰਾਬ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਫੇਰ ਤਾਂ ਪੰਡਤ ਮਾਲਵੀਆ ਜੈਸੇ ਬੜੇ ਸਮਾਜ ਸੁਧਾਰਕ, ਅਛੂਤਾਂ ਦੇ ਬਹੁਤ ਬੜੇ ਪ੍ਰੇਮੀ ਤੇ ਹੋਰ ਵੀ ਨਾ ਜਾਣੇ ਕੀ- ਪਹਿਲੋਂ ਇੱਕ ਚੂਹੜੇ ਦੇ ਹੱਥੋਂ ਹਾਰ ਪੁਆ ਲੇਂਦੇ ਹਨ, ਪਿੱਛੋਂ ਕੱਪੜਿਆਂ ਸਮੇਤ ਇਸ਼ਨਾਨ ਕੀਤਿਆ ਬਿਨ੍ਹਾਂ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਅਸ਼ੁੱਧ ਸਮਝਦੇ ਹਨ। ਕਿਆ ਖੂਬ ਇਹ ਚਾਲ ਹੈ ਸਭ ਨੂੰ ਪਿਆਰ ਕਰਨ ਵਾਲਾ ਰੱਬ! ਉਸ ਦੀ ਪੂਜਾ ਕਰਨ ਵਾਸਤੇ ਜੋ ਮੰਦਰ ਬਣਿਆ ਹੈ, ਉੱਥੇ ਅਗਰ ਉਹ ਗਰੀਬ ਜਾ ਵੜੇ ਤਾਂ ਮੰਦਰ ਪਲੀਤ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਰੱਬ ਨਾਰਾਜ਼ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਘਰ ਦੀ ਇਹ ਹਾਲਤ ਹੋਵੇ ਤੇ ਬਾਹਰ ਅਸੀਂ Equality ਜਾਂ ਬਰਾਬਰੀ ਦੇ ਨਾਮ ‘ਤੇ ਝਗੜਦੇ ਚੰਗੇ ਲੱਗਦੇ ਹਾਂ? ਫਿਰ ਸਾਡੇ ਰਵੱਈਏ ਵਿਚ ਕ੍ਰਿਤਘਣਤਾ ਦੀ ਹੱਦ ਪਾਈ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। ਜੋ ਸਾਡੇ ਵਾਸਤੇ ਨੀਚ ਤੋਂ ਨੀਚ ਕੰਮ ਕਰਕੇ ਸਾਡੇ ਸੁੱਖਾਂ ਵਿਚ ਵਾਧਾ ਕਰਦੇ ਹਨ, ਉਨਾਂ ਨੂੰ ਹੀ ਅਸੀਂ ਪਰੇ-ਪਰੇ ਕਰਦੇ ਹਾਂ। ਜਾਨਵਰਾਂ ਦੀ ਪੂਜਾ ਕਰ ਸਕਦੇ ਹਾਂ, ਪਰ ਇਨਸਾਨ ਨੂੰ ਕੋਲ ਵੀ ਨਹੀਂ ਬਿਠਾ ਸਕਦੇ ?
       ਅੱਜ ਇਸ ਸਵਾਲ ‘ਤੇ ਬਹੁਤ ਸ਼ੋਰ ਹੋ ਰਿਹਾ ਹੈ: ਉਨਾਂ ਵਿਚਾਰਿਆਂ ਵੱਲ ਅੱਜ-ਕੱਲ ਖ਼ਾਸ ਧਿਆਨ ਦਿੱਤਾ ਜਾ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਮੁਲਕ ਵਿਚ ਆਜ਼ਾਦੀ ਦਾ ਜੋ ਵਿਕਾਸ ਹੋ ਰਿਹਾ ਹੈ, ਉਸ ਵਿਚ ਫਿਰਕਾਵਾਰਾਨਾ ਨਿਆਬੁਤ ਨੇ ਹੋਰ ਕੋਈ ਫਾਇਦਾ ਕੀਤਾ ਹੋਵੇ ਜਾਂ ਨਾ ਕੀਤਾ ਹੋਵੇ, ਇਹ ਫਾਇਦਾ ਜ਼ਰੂਰ ਕੀਤਾ ਹੈ ਕਿ ਵਧੀਕ ਹਕੂਕ ਮੰਗਣ ਵਾਸਤੇ ਆਪਣੀ ਕੌਮ ਦੀ ਗਿਣਤੀ ਵਧਾਉਣ ਦਾ ਫਿਕਰ ਸਭਨਾਂ ਨੂੰ ਪਿਆ। ਮੁਸਲਮਾਨਾਂ ਨੇ ਜ਼ਰਾ ਵਧੇਰੇ ਜ਼ੋਰ ਦਿੱਤਾ। ਉਹਨਾਂ ਅਛੂਤਾਂ ਨੂੰ ਮੁਸਲਮਾਨ ਬਣਾ-ਬਣਾ ਕੇ ਆਪਣੇ ਬਰਾਬਰ ਦੇ ਇਨਸਾਨ ਬਣਾ ਕੇ ਉਨਾਂ ਨੂੰ ਆਦਮੀ ਦੇ ਹਕੂਕ ਦੇਣੇ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰ ਦਿੱਤੇ। ਹੁਣ ਹਿੰਦੂਆਂ ਦੇ ਵੀ ਸੱਟ ਵੱਜੀ। ਜ਼ਿਦ ਵਧੀ। ਫ਼ਸਾਦ ਵੀ ਹੋਏ। ਖ਼ੈਰ! ਹੌਲੀ-ਹੌਲੀ ਸਿੱਖਾਂ ਵਿੱਚ ਵੀ ਖਿਆਲ ਪੈਦਾ ਹੋਇਆ ਕਿ ਅਸੀਂ ਨਾ ਪਿੱਛੇ ਰਹਿ ਜਾਈਏ। ਉਨਾਂ ਵੀ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ‘ਛਕਾਉਣਾ’ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰ ਦਿੱਤਾ। ਹਿੰਦੂਆਂ ਸਿੱਖਾਂ ਵਿਚ ਅਛੂਤਾਂ ਦੇ ਜਨੇਊ ਲਾਹੁਣ ਜਾਂ ਕੇਸ ਕਟਾਵਾਉਣ ਦੇ ਸਵਾਲਾਂ ‘ਤੇ ਝਗੜੇ ਹੋਏ। ਹੁਣ ਤਿੰਨੇ ਕੌਮਾਂ ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਆਪਣੇ ਵੱਲ ਖਿੱਚ ਰਹੀਆਂ ਹਨ ਤੇ ਬੜਾ ਸ਼ੋਰ ਸ਼ਰਾਬਾ ਹੈ। ਓਧਰ ਈਸਾਈ ਚੁੱਪ-ਚਾਪ ਉਨਾਂ ਦਾ ਰੁਤਬਾ ਵਧਾ ਰਹੇ ਹਨ। ਇਸ ਸਾਰੀ ਹਲ ਚਲ ਨਾਲ ਹਿੰਦੋਸਤਾਨ ਦੀ ਲਾਹਨਤ ਦੂਰ ਹੋ ਰਹੀ ਹੈ।
       ਇਧਰ ਜਦ ਅਛੂਤਾਂ ਨੇ ਦੇਖਿਆ ਕੀ ਸਾਡੀ ਖਾਤਰ ਇਨਾਂ ਵਿੱਚ ਫ਼ਸਾਦ ਹੋ ਰਿਹਾ ਹੈ ਅਤੇ ਹਰ ਕੋਈ ਸਾਨੂੰ ਹਰ ਕੋਈ ਆਪਣੀ ਆਪਣੀ ਖ਼ੁਰਾਕ ਸਮਝ ਰਿਹਾ ਹੈ, ਤਾਂ ਅਸੀਂ ਜੁਦੇ ਹੀ ਕਿਉਂ ਨਾ ਸੰਗਠਤ ਹੋਈਏ। ਇਸੇ ਖਿਆਲ ਨੂੰ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰਨ ਵਿੱਚ ਸਰਕਾਰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਦਾ ਕੋਈ ਹੱਥ ਹੋਵੇ ਜਾਂ ਨਾ ਹੋਵੇ, ਏਨਾ ਜ਼ਰੂਰ ਹੈ ਕਿ ਉਸ ਦੇ ਪ੍ਰਚਾਰ ਵਿਚ ਸਰਕਾਰੀ ਆਦਮੀਆਂ ਦਾ ਵੀ ਕਾਫੀ ਹੱਥ ਹੈ ਸੀ। ਆਦਿ ਧਰਮ ਮੰਡਲ ਆਦਿਕ ਉਸੇ ਵਿਚਾਰ ਦੇ ਪ੍ਰਚਾਰ ਦਾ ਨਤੀਜਾ ਹਨ।
       ਹੁਣ ਇੱਕ ਸਵਾਲ ਹੋਰ ਉੱਠਦਾ ਹੈ ਕਿ ਇਸ ਮਸਲੇ ਦਾ ਠੀਕ-ਠੀਕ ਹੱਲ ਕੀ ਹੈ? ਇਸ ਦਾ ਜਵਾਬ ਬੜਾ ਸੈਹਲ ਹੈ। ਸਭ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਇਹ ਫੈਸਲਾ ਕਰ ਲੈਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ ਕਿ ਸਭ ਇਨਸਾਨ ਇਕੋ ਜਿਹੇ ਹਨ ਅਤੇ ਨਾ ਤੇ ਜਨਮ ਨਾਲ ਕੋਈ ਭਿੰਨ ਭੇਦ ਪੈਂਦਾ ਹੈ ਤੇ ਨਾ ਕੰਮਕਾਜ ਨਾਲ। ਯਾਨੀ ਚੂੰਕਿ ਇੱਕ ਆਦਮੀ ਗਰੀਬ ਭੰਗੀ ਦੇ ਘਰ ਪੈਦਾ ਹੋ ਗਿਆ ਹੈ, ਇਸ ਕਰਕੇ ਸਾਰੀ ਉਮਰ ਟੱਟੀਆਂ ਹੀ ਸਾਫ ਕਰੇਗਾ ਅਤੇ ਦੁਨੀਆਂ ਵਿਚ ਕਿਸੇ ਕਿਸਮ ਦੀ ਤਰੱਕੀ ਦਾ ਉਸਨੂੰ ਕੋਈ ਹੱਕ ਨਹੀਂ। ਇਹ ਗੱਲਾਂ ਫਜੂਲ ਹਨ। ਇਹਨਾਂ ਵਰਗਿਆਂ ਆਦਮੀਆਂ ਨਾਲ ਜਦੋਂ ਸਾਡੇ ਬਜ਼ੁਰਗ ਆਰੀਅਨ ਲੋਕਾਂ ਨੇ ਇਹ ਜ਼ੁਲਮ ਕੀਤਾ ਅਤੇ ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਨੀਚ ਕਹਿ ਕੇ ਪਰ੍ਹੇ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਅਤੇ ਨੀਚ ਕੰਮ ਕਰਵਾਉਣ ਲੱਗ ਪਏ ਅਤੇ ਨਾਲ ਹੀ ਇਹ ਵੀ ਫਿਕਰ ਪਿਆ ਕਿ ਇਹ ਬਗਾਵਤ ਨਾ ਕਰ ਦੇਣ, ਤਦੋਂ ਪੁਨਰ-ਜਨਮ ਦੀ ਫਿਲਾਸਫੀ ਦਾ ਪ੍ਰਚਾਰ ਕਰਨਾ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰ ਦਿੱਤਾ। ਇਹ ਤੁਹਾਡੇ ਪੁਰਾਣੇ ਜਨਮ ਦੇ ਪਾਪਾਂ ਦਾ ਫਲ ਹੈ। ਕੀ ਹੋ ਸਕਦਾ ਹੈ? ਚੁੱਪ ਕਰਕੇ ਕਰੋ। ਇਸ ਤਰਾਂ ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਸਬਰ ਦਾ ਸਬਕ ਪੜ੍ਹਾ ਕੇ ਉਹ ਲੋਕੀ ਇਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਚਿਰ ਵਾਸਤੇ ਚੁੱਪ ਕਰਵਾ ਗਏ। ਪਰ ਉਹਨਾਂ ਬੜਾ ਪਾਪ ਕੀਤਾ। ਇਨਸਾਨਾਂ ਦੇ ਅੰਦਰੋਂ ਇਨਸਾਨੀਅਤ ਦਾ ਮਾਦਾ ਆਤਮ-ਵਿਸ਼ਵਾਸ਼, ਅਤੇ ਆਤਮ-ਨਿਰਭਰਤਾ ਦਾ ਭਾਵ ਮਾਰ ਸੁੱਟਿਆ। ਬੜਾ ਜ਼ੁਲਮ ਤੇ ਕਹਿਰ ਕਮਾਇਆ। ਖੈਰ, ਅੱਜ ਉਹਦੇ ਪਰਾਸ਼ਚਿਤ ਦਾ ਵੇਲਾ ਹੈ।
       ਇਸੇ ਦੇ ਨਾਲ ਹੀ ਇੱਕ ਹੋਰ ਖਰਾਬੀ ਪੈਦਾ ਹੋ ਗਈ। ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਦਿਲਾਂ ਵਿੱਚ ਜ਼ਰੂਰੀ ਕੰਮਾਂ ਵਾਸਤੇ ਘਿਰਣਾ ਪੈਦਾ ਹੋ ਗਈ। ਅਸੀਂ ਜੁਲਾਹੇ ਨੂੰ ਵੀ ਪਰੇ ਦੁਰਕਾਰ ਦਿੱਤਾ ਅਤੇ ਅੱਜ ਕੱਪੜਾ ਬੁਣਨ ਵਾਲੇ ਅਛੂਤ ਸਮਝੇ ਜਾਂਦੇ ਹਨ। ਯੂ.ਪੀ. ਵੱਲ ਕਹਾਰ (ਝੀਰ) ਨੂੰ ਵੀ ਅਛੂਤ ਸਮਝਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਇਸ ਨਾਲ ਬੜੀ ਖਰਾਬੀ ਪੈਦਾ ਹੋ ਗਈ, ਜਿਸ ਨਾਲ ਸਾਡੀ ਤਰੱਕੀ ਵਿਚ ਬੜੀ ਰੁਕਾਵਟ ਪੈਂਦੀ ਹੈ।
       ਇਨਾਂ ਗੱਲਾਂ ਨੂੰ ਸਾਹਮਣੇ ਰੱਖਦੇ ਹੋਏ ਅਸੀਂ ਅੱਗਾਂਹ ਵਧੀਏ। ਇਹਨਾਂ ਨੂੰ ਅਛੂਤ ਨਾ ਕਹੀਏ ਤੇ ਨਾ ਹੀ ਸਮਝੀਏ। ਬਸ, ਮੁਆਮਲਾ ਸਾਫ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਨੌਜਵਾਨ ਭਾਰਤ ਸਭਾ ਅਤੇ ਨੌਜਵਾਨ ਕਾਨਫਰੰਸ ਨੇ ਜੋ ਤਰੀਕਾ ਅਖਤਿਆਰ ਕੀਤਾ ਹੈ, ਉਹ ਡਾਢਾ ਸੁੰਦਰ ਹੈ। ਜਿਨਾਂ ਭਰਾਵਾਂ ਨੂੰ ਅੱਜ ਤੀਕ ਅਛੂਤ-ਅਛੂਤ ਕਿਹਾ ਕਰਦੇ ਸਾਂ, ਉਨਾਂ ਕੋਲੋਂ ਇਸ ਪਾਪ ਵਾਸਤੇ ਖਿਮਾਂ ਮੰਗਣੀ ਅਤੇ ਉਨਾਂ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਵਰਗਾ ਆਦਮੀ ਸਮਝਣਾਂ, ਬਿਨਾਂ ਅਮ੍ਰਿਤ ਛਕਾਇਆਂ, ਕਲਮਾਂ ਪੜਾਇਆਂ ਜਾਂ ਸ਼ੁੱਧ ਕੀਤਿਆਂ ਹੀ ਉਹਨੂੰ ਆਪਣੇ ਵਿਚ ਰਲ੍ਹਾ ਲੈਣਾ, ਉਹਦੇ ਹੱਥ ਦਾ ਪਾਣੀ ਪੀਣਾ ਇਹੋ ਠੀਕ ਤਰੀਕਾ ਹੈ ਤੇ ਆਪੋ ਵਿੱਚ ਖਿੱਚਧੂਹੀ ਕਰਨੀ ਅਤੇ ਅਮਲ ਵਿਚ ਕੋਈ ਵੀ ਹੱਕ ਨਾ ਦੇਣਾ, ਕੋਈ ਠੀਕ ਗੱਲ ਨਹੀਂ ਹੈ।
       ਜਦੋਂ ਪਿੰਡਾਂ ਵਿਚ ਕਿਰਤੀ ਪ੍ਰਚਾਰ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋਇਆ, ਉਦੋਂ ਜੱਟਾਂ ਨੂੰ ਸਰਕਾਰੀ ਆਦਮੀ ਇਹ ਗੱਲ ਸਮਝਾ ਕੇ ਭੜਕਾਉਂਦੇ ਸਨ ਕਿ ਦੇਖੌ ਇਹ ਚੂਹੜਿਆਂ ਚੱਪੜੀਆਂ ਨੂੰ ਸਿਰ ‘ਤੇ ਚੜ੍ਹਾ ਰਹੇ ਹਨ ਅਤੇ ਤੁਹਾਡਾ ਕੰਮ ਬੰਦ ਕਰਾਊ ਹਨ। ਬਸ, ਜੱਟ ਏਨੇ ਵਿੱਚ ਹੀ ਭੂਤ ਪਏ। ਉਨਾਂ ਨੂੰ ਯਾਦ ਰੱਖਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ ਕਿ ਇਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਹਾਲਤ ਓਨਾਂ ਚਿਰ ਨਹੀਂ ਸੁਧਰ ਸਕਦੀ ਜਿਨਾਂ ਚਿਰ ਕਿ ਉਹ ਇਨਾਂ ਗ਼ਰੀਬਾਂ ਨੂੰ ਕਮੀਣ ਅਤੇ ਨੀਚ ਕਹਿ ਕੇ ਆਪਣੇ ਪੈਰਾਂ ਹੇਠ ਦੱਬੀ ਰੱਖਣਾ ਚਾਹੁੰਦੇ ਹਨ। ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਕਿ ਉਹ ਸਾਫ ਨਹੀਂ ਰਹਿੰਦੇ? ਇਸਦਾ ਜਵਾਬ ਸਾਫ ਹੈ, ਉਹ ਗਰੀਬ ਹਨ। ਗ਼ਰੀਬੀ ਦਾ ਇਲਾਜ਼ ਕਰੋ। ਉੱਚੀਆਂ-ਉੱਚੀਆਂ ਕੁਲਾਂ ਦੇ ਗ਼ਰੀਬ ਲੋਕੀ ਕੋਈ ਘੱਟ ਗੰਦੇ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦੇ। ਗੰਦਾ ਕੰਮ ਕਰਨ ਦਾ ਬਹਾਨਾ ਵੀ ਨਹੀਂ ਲੱਗ ਸਕਦਾ। ਮਾਵਾਂ ਬੱਚਿਆਂ ਦਾ ਗੰਦ ਸਾਫ ਕਰਨ ਨਾਲ ਚੂਹੜੀਆਂ ਤੇ ਅਛੂਤ ਨਹੀਂ ਹੋ ਜਾਂਦੀਆਂ।
       ਪਰ ਇਹ ਕੰਮ ਉਨ੍ਹਾਂ ਚਿਰ ਨਹੀਂ ਹੋ ਸਕਦਾ, ਜਦੋਂ ਤੱਕ ਕਿ ਅਛੂਤ ਕੌਮਾਂ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਸੰਗਠਿਤ ਨਾ ਕਰ ਲੈਣ।ਅਸੀਂ ਤਾਂ ਸਮਝਦੇ ਹਾਂ ਕਿ ਉਨਾਂ ਦਾ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਵੱਖਰਾ ਜੱਥਬੰਦ ਕਰਨਾਂ ਤੇ ਮੁਸਲਮਾਨਾਂ ਦੇ ਬਰਾਬਰ ਗਿਣਤੀ ਵਿਚ ਹੋਣ ਕਰਕੇ ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਬਰਾਬਰ ਦੇ ਹੱਕ-ਹਕੂਕ ਮੰਗਣਾ ਬੜੀ ਆਸ਼ਾਜਨਕ ਤਹਿਰੀਕ ਹੈ। ਜਾਂ ਤੇ ਫਿਰਕਾਵਾਰਾਨਾ ਨਿਆਂਬੁਤ ਦਾ ਟੰਟਾ ਹੀ ਮੁਕਾਓ ਨਹੀਂ ਤੇ ਉਨਾਂ ਦੇ ਵੱਖਰੇ ਹਕੂਕ ਉਨਾਂ ਨੂੰ ਦੇਵੋ। ਕੌਸਲਾਂ ਅਤੇ ਅਸੈਂਬਲੀਆਂ ਦਾ ਫ਼ਰਜ਼ ਹੈ ਕਿ ਸਕੂਲ, ਕਾਲਜ, ਖੂਹ ਅਤੇ ਸੜਕਾਂ ਦੇ ਇਸਤੇਮਾਲ ਦੀ ਪੂਰੀ ਅਜਾਦੀ ਇਹਨਾਂ ਨੂੰ ਦੁਵਾਉਣ। ਜ਼ਬਾਨੀ ਹੀ ਨਹੀਂ, ਬਲਕਿ ਨਾਲ ਲਿਜਾ ਕੇ ਉਨਾਂ ਨੂੰ ਖੂਹਾਂ ਉੱਤੇ ਚੜਾਉਣ, ਨਾਲ ਲੈ ਜਾਕੇ ਉਨਾਂ ਦੇ ਬੱਚਿਆਂ ਨੂੰ ਮਦਰੱਸਿਆਂ ਵਿਚ ਭਰਤੀ ਕਰਵਾਉਣ। ਪਰ, ਜਿਸ ਲੈਜੀਸਲੇਟਿਵ ਵਿੱਚ ਛੋਟੀ ਉਮਰ ਵਿਚ ਵਿਆਹ ਦੇ ਵਿਰੁੱਧ ਪੇਸ਼ ਕੀਤੇ ਗਏ ਬਿੱਲ ‘ਤੇ ਮੱਜ਼ਹਬ ਦੇ ਬਹਾਨੇ ਲੈ ਕੇ ਹਾਏ-ਤੌਬਾ ਮਚਾ ਦਿੱਤੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ, ਉਥੇ ਅਛੂਤਾਂ ਨੂੰ ਨਾਲ ਰਲਾਉਣ ਦੀ ਹਿੰਮਤ ਉਹ ਕਿਸ ਤਰਾਂ ਕਰ ਸਕਦੇ ਹਨ।
       ਇਸ ਕਰਕੇ ਅਸੀਂ ਕਹਿੰਦੇ ਹਾਂ ਕਿ ਉਨਾਂ ਦੇ ਆਪਣੇ ਨੁਮਾਇੰਦੇ ਕਿਉਂ ਨਾ ਹੋਣ? ਉਹ ਆਪਣੀ ਵੱਖਰੀ ਤਾਦਾਦ ਕਿਉਂ ਨਾ ਮੰਗਣ? ਅਸੀਂ ਤਾਂ ਸਾਫ ਕਹਿੰਦੇ ਹਾਂ ਕਿ ਉਠੋ! ਅਛੂਤ ਕਹਾਉਣ ਵਾਲੇ ਅਸਲੀ ਸੇਵਕੋ ਤੇ ਵੀਰੋ ਉੱਠੋ! ਆਪਣਾ ਇਤਿਹਾਸ ਦੇਖੋ! ਗੁਰੂ ਗੋਬਿੰਦ ਸਿੰਘ ਜੀ ਦੀ ਫੌਜ ਦੀ ਅਸਲੀ ਤਾਕਤ ਤੁਹਾਡੀ ਸੀ। ਸ਼ਿਵਾ ਜੀ ਤੁਹਾਡੇ ਆਸਰੇ ਹੀ ਸਭ ਕੁਝ ਕਰ ਸਕਿਆ, ਜਿਸ ਨਾਲ ਕਿ ਅੱਜ ਉਸਦਾ ਨਾਂ ਅੱਜ ਤੱਕ ਜਿੰਦਾ ਹੈ। ਤੁਹਾਡੀਆਂ ਕੁਰਬਾਨੀਆਂ ਸੋਨੇ ਦੇ ਅੱਖਰਾਂ ਵਿਚ ਲਿਖੀਆਂ ਹੋਈਆਂ ਹਨ। ਤੁਸੀਂ ਜੋ ਨਿੱਤ ਸੇਵਾ ਕਰਕੇ, ਕੌਮ ਦੇ ਸੁੱਖ ਵਿਚ ਵਾਧਾ ਕਰਕੇ ਅਤੇ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਮੁਮਕਿਨ ਬਣਾ ਕੇ ਇੱਕ ਬੜਾ ਭਾਰੀ ਅਹਿਸਾਨ ਕਰ ਰਹੇ ਹੋ, ਉਸ ਨੂੰ ਅਸੀਂ ਲੋਕ ਨਹੀਂ ਸਮਝਦੇ। (Land Alienation Act) ਇੰਤਕਾਲੇ- ਇਰਾਜ਼ੀ ਐਕਟ ਦੇ ਮੁਤਾਬਿਕ ਤੁਸੀਂ ਪੈਸੇ ਇੱਕਠ ਕਰਕੇ ਵੀ ਜ਼ਮੀਨ ਨਹੀਂ ਖਰੀਦ ਸਕਦੇ। ਤੁਹਾਡੇ ‘ਤੇ ਏਨਾਂ ਜ਼ੁਲਮ ਹੋ ਰਿਹਾ ਹੈ ਕਿ ਅਮਰੀਕਾ ਦੀ ਮਿਸ ਮੇਯੋ, (less than men) ਮਨੁੱਖਾਂ ਨਾਲੋਂ ਬਹੁਤ ਹੇਠਾਂ ਕਹਿੰਦੀ ਹੈ। ਉੱਠੋ! ਆਪਣੀ ਤਾਕਤ ਪਛਾਣੋ। ਜਥੇਬੰਦ ਹੋ ਜਾਓ। ਅਸਲ ਵਿਚ ਤੇ ਤੁਹਾਡੇ ਆਪਣੇ ਯਤਨ ਕੀਤਿਆਂ ਬਿਨਾਂ ਤੁਹਾਨੂੰ ਕੁਝ ਵੀ ਨਹੀਂ ਮਿਲ ਸਕੇਗਾ। (Those who would be free must themselves strike the blow) ਆਜ਼ਾਦੀ ਦੀ ਖਾਤਰ ਆਜ਼ਾਦੀ ਚਾਹੁਣ ਵਾਲਿਆਂ ਨੂੰ ਜਤਨ ਕਰਨਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ।
       ਮਨੁੱਖ ਦੀ ਹੌਲੀ-ਹੌਲੀ ਕੁੱਝ ਇਹੋ ਜਹੀ ਆਦਤ ਹੋ ਗਈ ਹੈ ਕਿ ਆਪਣੇ ਵਾਸਤੇ ਤੇ ਉਹ ਹੱਕ ਮੰਗਣਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਪਰ ਜਿਨਾਂ ‘ਤੇ ਉਹਦਾ ਆਪਣਾ ਦਬਦਬਾ ਹੋਵੇ, ਉਨਾਂ ਨੂੰ ਉਹ ਪੈਰਾਂ ਥੱਲੇ ਹੀ ਰੱਖਣਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਇਸ ਕਰਕੇ ‘ਲੱਤਾਂ ਦੇ ਭੂਤ ਗੱਲਾਂ ਨਾਲ ਨਹੀਂ ਮੰਨਿਆ ਕਰਦੇ’। ਜਥੇਬੰਦ ਹੋ ਕੇ ਹੋ ਕੇ ਆਪਣੇ ਪੈਰਾਂ ‘ਤੇ ਖਲ੍ਹੋ ਕੇ ਸਾਰੇ ਸਮਾਜ ਨੂੰ ਚੈਲੰਜ ਕਰ ਦਿਓ। ਦੇਖੋ ਤਾਂ ਫਿਰ ਕੌਣ ਤੁਹਾਡੇ ਹੱਕ ਦੇਣ ਤੋਂ ਇਨਕਾਰ ਕਰਨ ਦੀ ਜੁਅਰਤ ਕਰ ਸਕੇਗਾ। ਤੁਸੀਂ ਲੋਕਾਂ ਦੀ ਖੁਰਾਕ ਨਾ ਬਣੋ। ਦੂਜਿਆਂ ਦੇ ਮੂੰਹ ਵੱਲ ਨਾ ਤੱਕੋ। ਪਰ ਖਿਅਲ ਰੱਖਣਾ। ਨੌਕਰਸ਼ਾਹੀ ਦੇ ਝਾਂਸੇ ਵਿਚ ਵੀ ਨਾ ਆਉਣਾ। ਇਹ ਤੁਹਾਡੀ ਮਦਦ ਨਹੀਂ ਕਰਨਾ ਚਾਹੁੰਦੀ। ਬਲਕਿ ਤੁਹਾਨੂੰ ਆਪਣਾ ਟੂਲ (ਸੰਦ) ਬਣਾਉਣਾ ਚਾਹੁੰਦੀ ਹੈ। ਇਹ ਸਰਮਾਏਦਾਰ ਨੌਕਰਸ਼ਾਹੀ ਤੁਹਾਡੀ ਗੁਲਾਮੀ ਅਤੇ ਗ਼ਰੀਬੀ ਦਾ ਮੁੱਖ ਕਾਰਨ ਹੈ। ਇਸ ਕਰੇ ਉਸ ਨਾਲ ਤੁਸੀਂ ਨਾ ਮਿਲਣਾ। ਉਸ ਦੀਆਂ ਚਾਲਾਂ ਕੋਲੋਂ ਬਚਣਾ। ਬਸ! ਫਿਰ ਕੰਮ ਬਣ ਜਾਵੇਗਾ। ਤੁਸੀਂ ਅਸਲੀ ਕਿਰਤੀ ਹੋ। ਕਿਰਤੀਉ ਜਥੇਬੰਦ ਹੋ ਜਾਓ। ਤੁਹਾਡਾ ਕੁਝ ਨੁਕਸਾਨ ਨਹੀਂ ਹੋਵੇਗਾ ਕੇਵਲ ਗੁਲਾਮੀ ਦੀਆਂ ਜ਼ੰਜੀਰਾਂ ਕੱਟੀਆਂ ਜਾਣਗੀਆਂ। ਉਠੋ! ਅਤੇ ਮੌਜੂਦਾ ਨਿਜ਼ਾਮ ਦੇ ਵਿਰੁੱਧ ਬਗਾਵਤ ਖੜ੍ਹੀ ਕਰ ਦਿਓ। ਹੋਲੀ-ਹੋਲੀ ਸੁਧਾਰ ਅਤੇ ਰੀਫਾਰਮਾਂ ਨਾਲ ਕੁਝ ਨਹੀਂ ਬਣ ਸਕਦਾ। ਸਮਾਜਕ (Social) ਐਜੀਟੇਸ਼ਨ/ਇਨਕਲਾਬ ਪੈਦਾ ਕਰ ਦਿਓ ਅਤੇ ਪਲੀਟੀਕਲ ਤੇ ਆਰਥਿਕ ਇਨਕਲਾਬ ਵਾਸਤੇ ਕਮਰਕੱਸੇ ਕਰ ਲਵੋ। ਤੁਸੀਂ ਹੀ ਤੇ ਮੁਲਕ ਦੀ ਜੜ੍ਹ ਹੋ, ਅਸਲੀ ਤਾਕਤ ਹੋ। ਉਠੋ! ਸੁੱਤੇ ਹੋਏ ਸ਼ੇਰੋ, ਵਿਦਰੋਹੀਓ, ਵਿਪੱਲਵ ਜਾਂ ਵਿਦਰੋਹ ਖੜ੍ਹਾ ਕਰ ਦਿਓ!                                           
– ਵਿਦਰੋਹੀ
(ਭਗਤ ਸਿੰਘ ਵਲੋਂ ਜੂਨ 1928 ਦੇ ‘ਕਿਰਤੀ’ ਰਸਾਲੇ ਵਿਚ ਵਿਦਰੋਹੀ ਦੇ ਕਲਮੀ ਨਾਮ ਹੇਠ ਲਿਖਿਆ ਗਿਆ ਲੇਖ)